मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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एक विवाह ऐसा भी.

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अब क्या करें, शादियों का मौसम आते ही हमारा पूरा शहर बैंड-बाजों और बड़े-बड़े लाउड स्पीकरों से गूंज उठता है. ठहेरिये! मैं यहाँ किसी शादी की कहानी या किसी चीज का विरोध नहीं करने आया, मैं तो आज आपका परिचय मैथिल विवाह पद्धति से करने आया हूँ.
हम मैथिलों को अपनी मान्यताएं, अपने संस्कार और अपने आचरण पर बड़ा गर्व है. और हो भी क्यूँ नहीं, सदियों से हम अपने संसकार, वो संस्कार जिसके बिना हम अधूरे हैं, निभाते आ रहे हैं. एइसे ही एक संस्कार विवाह; वह संस्कार जो मानव के जीवन को परिभाषित करती है, के मैथिल संस्करण से आपका साक्षात्कार प्रस्तुत है.
तो श्रीमान कहानी सुनाने से पहले आपको ये बता दूँ की, हम मैथिलों में विधि-विधानों की संख्या कुछ अधिक है. तो श्रीमान के पास अगर समय का आभाव न हो तो ही आगे बढें. क्यूंकि ये कहानी थोड़ी लम्बी है.
मेरा नाम जटाशंकर मिश्र है. मेरे दो लड़के हैं, मंगनू मिश्र और अंजनी मिश्र. मंगनू मेरा बड़ा बेटा और अंजनी छोटा पुत्र है. मेरी सांवली सी और शर्मीली पत्नी का नाम, करुणा है. बिलकुल करुणा की देवी है मेरी पत्नी. मेरे बड़े बेटे की शादी मैंने पिछले वर्ष ही की है. लेकिन क्या करूँ मेरा छोटा बेटा भी अब शादी के लायक हो गया है. मैं कबिलपुर मैं रहता हूँ. दरभंगा शहर का बहुत मशहूर गाँव है ये. या यूँ कहिये मोहल्ला है. हमने पिछले कुछ वर्षों में बहुत तरक्की कर ली है.
मैं अपने पुत्र के लिए एक अछि कन्या की तलाश में था. पास के ही आनंदपुर से मेरे छोटे बेटे के लिए एक रिश्ता आया. लड़की बहुत सुशिल और सुन्दर थी. मैंने हाँ कर दी. चंद्रकांत झा, ये मेरे बेटे के होने वाले ससुर जी का नाम है. चंदर जी को मैंने कहा की मुझे आपकी लड़की पसंद है. चंदर जी ने मुझसे मेरा गोत्र और मूल पूछा.
“मेरा गोत्र शांडिल्य और मूल छतवान है”. (गोत्र का अर्थ की आप किस ऋषि के वंशज हैं और मूल से तात्पर्य आपके मूल निवास स्थान से है.)
चंदर जी विदा हो लिए.
मैंने अन्दर जाते ही अपनी श्रीमती जी से कहा, लड़की वालों का मूल गोविंदपुर और गोत्र वत्स है. मैंने उनसे कहा की आप अधिकार पत्र ले आइये. तुम्हें तो पता ही है की हम मैथिलों में क्या-क्या विधि विधान हैं. मैं उसे समझाने लगा. देखो, हम तो लड़का पक्ष की सात पीढ़ी और लड़की पक्ष की पांच पीढ़ी तक गोत्रों का अवलोकन करते हैं. जब वो सौराठ जा कर पंजीकार से अधिकारपत्र ले आयेंगे तो मैं तो विवाह पक्का कर दूंगा. मुझे तो लड़की बहुत पसंद है.
चंदर बाबु अगले दिन ही आये और १८/०६/२०१० की तिथि, मैथिलि पंचांग के अनुसार तय करके चले गए. मैंने अधिकार पत्र को अपने कुलदेवता नरसिंह के सामने रख कर विवाह के लिए आशीर्वाद माँगा. लड़की का नाम मैथिलि बताया उन्होंने. “जय महादेव! मैथिलि , साक्षात् देवी आएगी अपने घर में करुणा जी”. मैंने बहु का नाम अपनी श्रीमती जी को अपने अंदाज में बताया.
सोमवार का दिन था. दुल्हे को ले जाने के लिए दुल्हे का भाई मनोज गाड़ी लेकर आया. मेरी पत्नी, अपने बेटे का ‘चुमौन’ करने लगी.(मैथिलों में धान को, घर से निकलते वक़्त दुल्हे के सर के चरों तरफ घुमा कर, उसकी बला टालने की प्रथा ‘चुमौन’ है.)
हमारी गाड़ी आनंदपुर पहुंची. आज के ज़माने की हिसाब से ही सजा रखा था समधी जी ने शामियाने को.हम २१ लोग दुल्हे के साथ वरयात्री आये थे.(कानून के अनुसार अगर आपको कोर्ट मैरेज करनी है तो आपके विवाह के कागजात पर गवाहों के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं. मिथिला में वरयात्री उसी कानून का पर्याय हैं.)
मेरे और मेरे बेटे के लिए स्टेज पर दो दरबारी कुर्सी लगे हुए थे. मैं अपने सर पर पाग और खुद को धोती कुरते मैं पा कर पड़ा प्रसन्न था. लड़के की शादी में बाप की कुर्सी पर बैठने का आनद ही कुछ और होता है. और मेरा बेटा तो होनहार था, फिर तो मूंछें तननी ही थीं.
तभी शामियाने में एक रौबदार वृद्ध व्यक्ति के प्रवेश ने मेरा आकर्षण अपनी तरफ खींचा. हाथों में डाला(बांस से बनी थाली), लिए मेरे पुत्र के पास आकर उन्होंने कहा “मिश्र जी, ‘आज्ञा’ दीजिये.”. मेरे बेटे ने आज्ञा दी और विधि के अनुसार विवाह के कपडे और वांछित वस्तुएं देकर उन्हें विदा किया.
थोड़ी देर बाद स्त्रियों की एक टोली, विवाह के गीत को गाती, दुल्हे को ले जाने आई. मुझे तो इस बात की चिंता सता रही थी की सारे विधि-विधान सही से हों. मैं अपने बेटे के पीछे आकर खड़ा हो गया..स्त्रियाँ मेरे बेटे का ‘परिछन’ करने लगी.(मैथिलि का परिछन, हिंदी का परिक्षण है. इसमें स्त्रियाँ दुल्हे के नाक, कान, गाल वगैरह खिंच कर उसके स्वाभाव को जांचती हैं. फिर कछुए के खोल मैं धुप दाल कर आरती होती है वर की. कहा जाता है, मिर्गी के लक्षण वाले व्यक्ति को इस धुप के धुंए से तुरंत मूर्छा आ जाती है.)
स्त्रियाँ मेरे बेटे को लेकर आँगन के तरफ चलीं. आँगन पहुँच कर दूल्हा निरिक्षण का संस्कार संपन्न हुआ.(इस नियम मैं दुल्हे को सारे कपडे उतार कर, कन्या पक्ष के कपडे पहनने होते हैं. कहा जाता है की एइसा दुल्हे के शारीर को जांचने के लिए होता है.) उसके बाद स्त्रियाँ मेरे पुत्र को लेकर कुलदेवता पूजन को गयीं. वहां गौरी पूजन भी संपन्न हुआ. फिर मैथिल संस्कारानुसार, कन्या निरिक्षण हुआ. मैंने अपने बेटे को पहले ही समझा दिया था की इसमें दो लड़कियां एक साथ बैठी होंगी. तुम्हें अपनी पत्नी को पहचानना होता है. तो ये याद रखना की तुम्हारी पत्नी हमेशा बांयी तरफ बैठी होगी. मेरे पुत्र ने वैसे ही किया और अपनी पत्नी को पहचानने में कोई गलती नहीं की.
कन्यापक्ष के ८ ब्राह्मणों को बुलाकर, ओठंगर नामक संस्कार संपन्न कराया गया. इस नियम में आठों ब्रह्मण ओखली में धान रख कर कूटते हैं. माना जाता है की एइसा दो सभ्यताओं के मिलन को दर्शाने के लिए होता है. ये इस बात को प्रदर्शित करती है की विवाह दो कुलों का मिलन है.
फिर सारी स्त्रियाँ नाना-जोगिन के लिए इकठ्ठी हुईं. थल में फूल, पान के पत्ते और अगरबत्तियां इत्यादि रखपर दुल्हे की आरती हुई. स्त्रियों ने इश्वर से दुल्हे के सारे विकार हर कर उसे धन-धान्य देने की प्रार्थना की.
मेरे अनुसार अभी तक सब नियम सही सही हो रहे थे. सो में वहां से बारातियों के पास आया. मैंने चंदर बाबु से बारातियों के लिए दो दिन की व्यवस्था करने के लिए पहले ही कहा था. हमारे यहाँ ये प्रथा इसलिए है क्यूंकि विवाह के दिन वर-पक्ष और कन्या-पक्ष एक दुसरे को जान लें. गाँव की सारी व्यवस्था और लोगों से अवगत हो जाएँ. .
मेरे बड़े बेटे ने मुझसे पूछा “बाबूजी, विवाह कब तक संपन्न होगा?”.
नाना-जोगिन तो हो गया, अब लड़का लड़की बेदी पर बैठेंगे. पवित्र अग्नि के सामने. फिर वैदिक नियमों से उनका विवाह संपन्न होगा. लड़की की भाभी विधकरी बनी है.(कन्या के विवाह में, कन्या के सहायतार्थ उसके घर की जो स्त्री उसके साथ बैठती है, उसे विधकरी कहते हैं).
फेरों के बाद सिंदूरदान होगा. तुम्हें तो पता ही है. हमारी शादी के सारे संस्कारों के पीछे वैज्ञानिक कारण है. विवाह के दिन जो सिंदूर कन्या की मांग में डाला जाता है वो सिंदूर के जैसा ही दूसरा पदार्थ होता है. चतुर्थी की रात को ही कन्या की मांग में सिंदूर डाला जाता है. इसके पीछे भी एक कारण है, तुमने सुना होगा, ईसाईयों में विवाह से पहले डेटिंग का प्रावधान है. आप अपनी होने वाली पत्नी के साथ डेट पर जाएँ. एक दुसरे को समझें और अगर आप एक दुसरे को समझ सके तो विवाह संपन्न करें. हमारे यहाँ भी एइसा ही होता है. मैथिलों में चतुर्थी से पहले पत्नी के साथ शारीरिक सम्बन्ध वर्जित है. ये आपको एक दुसरे को समझने के लिए दिया गया समय है. आप दोनों में अगर कोई किसी को पसंद नहीं तो आप विवाह रोक सकते हैं. मैंने छोटे को ये बात बता दी है.
तभी आँगन से एक बच्चा आया और बोला “चाचा जी, घूँघट का समय हो गया है”. मैं आँगन पहुंचा, घूँघट की रस्म पूरी कर मैं वापस आ गया.
शादी संपन्न हो गयी और अगले दिन शाम को में वरयात्रियों के साथ वापस कबिलपुर आ गया.
चतुर्थी से एक दिन पहले ही अंजनी को घर देख कर में थोडा अचंभित हुआ. मैंने उसे अकस्मात आने का कारण पूछा.
“बाबूजी, आपने कहा था की चतुर्थी से पहले तक का समय डेटिंग की तरह है. सो विवाह के बाद वाली रात को मैथिलि ने मुझे बताया की वो सरवन नाम के एक लड़के से प्रेम करती है. मैं दो प्रेमियों को जुदा करने का पाप अपने सर कैसे ले सकता था. सो मैंने सीधे-सीधे मैथिलि के पिता जी से बात की और उनसे आग्रह किया की मैथिलि की शादी श्रवन से ही करायी जाए. और मैंने उन्हें चतुर्थी वाले नियम से भी अवगत करा दिया. हमारे नियम और संस्कार इसी लिए तो बने हैं, ताकि कुछ गलत न होने पाए.”
अपने बेटे के इस वचन पे थोडा क्रोध तो आया मुझे. लेकिन जो साहस उसने दिखाया था वो प्रशंशनीय था.

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