मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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मेरे दो एहसास; प्रेम और ममता के.

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“मैं अक्सर. अपनी जुदाई के बारे मैं सोच कर घबरा जाती हूँ. अंगद, मैं तुम्हें खो कर जी न पाउंगी. मुझे तुम पर, अपने आप से भी ज्यादा भरोसा है. एक तुम्हीं पर तो भरोसा है मुझे.” अंगद को बाहों में भरकर मैंने भीगी पलकों से ये लफ्ज़ कभी उससे कहे थे.
हमारे बगल वाले फ्लैट में, अपने माता पिता के साथ रहने आया था वो, काले शर्ट और ब्लू जींस में काफी आकर्षक लग रहा था वो. पहली नज़र में ही दिल दे बैठी थी मैं तो उसे. नरेन्द्र शर्मा उसके पिता का नाम था और माँ का नाम मालती था. शर्मा अंकल पास के ही स्कूल में शिक्षक थे. शर्मा आंटी जल्दी ही माँ से घुल मिल गयी. मेरी उम्र १७ साल की रही होगी उस वक़्त.
मुझे आज भी याद है जब अंगद पहली बार हमारे यहाँ आया, मैं उससे आँखें नहीं मिला पा रही थी. शायद उससे आँखें मिलते ही, चोरी पकरे जाने का डर था मुझे. धीरे-धीरे हम एक दुसरे के अच्छे दोस्त बन गए. मुझे कॉलेज मैं एडमिशन लेने रामपुर जाना था.
“अंगद, क्या तुम शेफाली को अपने साथ रामपुर ले जा सकते हो”?, पिता जी ने अंगद से पूछा.
“जी अंकल, कब निकलना है”?, उसने पिताजी की तरफ देख कर पूछा.
पिता जी ने अगली सुबह की ट्रेन से जाने को कहा. मैं और अंगद. ट्रेन से रामपुर पहुंचे, वहां एक अच्छे से होटल में हमने दो कमरे बुक किये. एक में अंगद रुके और एक में मैं. हम शाम तक कॉलेज मैं एडमिशन पाने मैं सफल रहे. अंगद और मैं वहां से सीधा होटल आये. खाना खाने के बाद वो मेरे कमरे मैं आया और मुझसे बातें करने लगा. बातों-बातों मैं उसने मुझे ये बता ही दिया की वो मुझे पसंद करता है. मैंने उसे खा की मैं सोच कर उसे बतौंगी. मन तो मुझे भी नहीं करना था, मैं तो बस उसे जांच परख कर देख रही थी. वो मुझसे सच मैं प्यार करता है की नहीं..
कुछ दिन उसे इन्तेजार करवाने के बाद मैंने हाँ कह दी. लोगों की नज़रें चुरा कर हम अब अक्सर मिलने लगे. प्यार भरी इन छोटी मुलाकातों का सिलसिला अगले दो साल चला. मैं अब कॉलेज के आखरी साल में थी. इस बार गर्मियों की छुट्टी में जब मैं घर आई तो अंगद मुझसे मिलते ही मुझसे कहने लगा की मैं तुमसे अकेले मिलना चाहता हूँ.
उस रात वो छत पर आया था. आते ही उसने मुझे बाहों लेते हुए कहा की मैं तुमसे अलग अब नहीं रह सकता. फिर हम दो जिस्म और एक जान हो गए.
कुछ दिनों बाद मुझे पता चला अंगद की शादी तय हो गयी है. वो अगले महीने किसी और से शादी करने वाला है. मुझे जैसे इस बात की भनक लगी, मुझे लगा किसी ने मेरे सीने पे एक साथ कई खंज़र चला दिए हों. किसपे भरोसा करूँ मैं. अब क्या करूँ? अंगद से मुझे ऐसी उम्मीद बिलकुल नहीं थी. मैंने उससे मिलने की बहुत कोशिश की. लेकिन आखरी बार मैंने उसे उसकी शादी के दो दिन बाद देखा. उसकी नौकरी लगी थी, दिल्ली जा रहा था वो अपनी बीवी के साथ.
“क्या हुआ “? पापा ने माँ से पूछा.
“शेफाली माँ बनाने वाली है”? , माँ ने धीरे से कहा.
पापा का चेहरा पीला पड़ गया. कुंवारी लड़की, माँ बनाने वाली हो तो इंसान टूट सा जाता है. पापा बिना कुछ बोले सोफे पे बैठ गए. माँ से मैंने साड़ी सच्चाई बता दी थी. माँ ने पापा को समझाया की लड़कपन मैं थोड़ी भटक गयी थी मैं. बात को बढ़ाये बिना मेरा गर्भपात करा दिया जाए.
“नहीं-नहीं, ये पाप मुझसे नहीं होगा माँ. मैंने तो प्रेम किया था. मेरी क्या गलती थी. मैं तो इस बच्चे को जनम दूंगी. आप लोगों की खातिर भले मैं इसे अपना नाम न दूँ. लेकिन मेरा बच्चा इस दुनि या मैं आएगा”, मैंने आपने दुपट्टे के आँचल मैं अपने बच्चे की भीख मांगी.
काफी मिन्नतों के बाद पापा मान गए. अगले दो साल मैं मौसी के पास जालंधर मैं रही. वहीँ मैंने अमृत को जनम दिया. जुदा तो नहीं होना चाहती थी मैं अमृत लेकिन इस समाज से मैं भी डर गयी. मैंने अपने अमृत को मौसी के यहाँ ही छोड़ दिया. मौसी के कोई बेटा न था. अमृत को बेटे की तरह ही पालने लगी मेरी मौसी. पापा मुझे वापस ले आये.
मेरी शादी हो गयी आपसे. मैं अपने बेटे से अलग रही. काफी कोशिश की मैंने उसे भूलने की. मैं तो शायद उसे भूल भी गयी थी. लेकिन वर्षों के इस शादी के रिश्ते के बावजूद जब कोई औलाद न हुई तो आपने बच्चा गोद लेने की बात की. मेरा दिल तो एक माँ का दिल है, अपने जिगर के टुकड़े के लिए क्यूँ न धरकता. मैं मौसी से अपने आँचल के सितारे को मांग लायी. ले आई मैं अपने आँखों के तारे, अमृत को अपने पास.
अगर आपको लगता है की मैंने पाप किया है तो आप बेशक मुझे सजा दें. मैं हर सजा के लिए तैयार हूँ.
“तुमने प्रेम को एक नयी परिभाषा दी है. शेफाली, प्यार तो मैंने भी किया है. मैंने तो तुम्हारे सिवा कभी किसी के बारे में सोचा भी नहीं. तुमसे जो हुआ, जाने-अनजाने, वो तुम्हारी जगह किसी से भी हो सकता था. मैंने तुमसे अमृत के इतनी जल्दी घुल -मिल जाने का कारण इसलिए नहीं पूछा था की मुझे तुम पर शक था. मैंने तो बस एइसे ही एक प्रश्न किया था. तुमने सारी बातें सच-सच बता कर मेरी नज़रों मैं अपनाप को काफी ऊँचा उठा लिया है
“शेफाली, तुम मेरी अर्धांगिनी हो. अमृत सिर्फ तुम्हारा ही नहीं मेरा भी बेटा है.”, मयंक ने मेरे माथे को चुल लिया और अमृत को गले से लगा लिया.

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495 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditi kailash के द्वारा
June 7, 2010

एक अच्छी रचना………..

    Nikhil के द्वारा
    June 7, 2010

    धन्यवाद अदिति जी.

    Infinity के द्वारा
    July 12, 2016

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rajkamal के द्वारा
June 6, 2010

अच्छा लेख है अपने में सच्चाई और एहसास लिय हुए- लेकिन बीच में कुछ लाइनस रह गई है-kher आगे और बेहतर की उम्मीद के साथ-

    Nikhil के द्वारा
    June 7, 2010

    धन्यवाद राजकमल जी. आपलोगों के आशीर्वाद और साथ को देखते हुए अब कवी बनाने को जी करता है.

ajaykumarjha1973 के द्वारा
June 6, 2010

आपकी शैली और प्रवाह देख कर बहुत ही प्रभावित हुआ । बहुत ही उम्दा लिखा है आपने । शुभकामनाएं

    Nikhil के द्वारा
    June 6, 2010

    धन्यवाद अजय जी. प्रेम निखिल

komal के द्वारा
June 6, 2010

अच्छा लेख है.

    Nikhil के द्वारा
    June 7, 2010

    लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद कोमल जी.

    Kairi के द्वारा
    July 12, 2016

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