मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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नारी को पुरुष और पुरुष को नारी न बनाएं, दोनों एक दुसरे के पूरक हैं; इन्हें पूरक ही रहने दे, दुश्मन न बनाएं.

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कहाँ जा रहे हैं हम? क्यूँ जा रहे हैं हम; अंधे, बहरे और गूंगों की तरह लोगों के कदम में कदम मिला कर, पीछे-पीछे चलते हुए? मेरे घर में इस बात की कमी है, समाज में ये बहुत बड़ा रोग है, ये लोग देश के लिए अभिशाप हैं- सिर्फ बातें और बातें. आग से भरी हुई, विष का बीज बोती, थोड़ी सच और थोड़ी झूठ बातें. मैं नारी के साथ हूँ, तुम नहीं हो; कभी कोई पुरुष इस तरह के सवाल उठता है तो कभी महिलाएं. मैं पूछता हूँ, क्या आपको नहीं लगता की नारी शशक्तिकरण की चाह में हमने एक इंसानों की एक नयी जमात तैयार कर ली है, जिसे एक दुसरे से प्यार नहीं, घृणा है?
एक दुसरे पर लांछन लगते हुए, क्या हमने स्वयं के अस्तित्व को भुलाना शुरू नहीं किया? जहाँ जाता हूँ, हर जगह मुझे बस एक ही बात सुनाई देती है- महिलाएं अब पहले जैसी नहीं रहीं, अब वो शशक्त और स्वावलंबी हो गयी हैं. अच्छी बात है, लेकिन उनके शशक्तिकरण को पुरुष समाज झेल नहीं पा रहा ऐसा कैसे कह सकते हैं आप? मैं मानता हूँ की हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है और इसमें कुछ विकृतियाँ हैं, जिन्हें बदलने की जरुरत है. नारियों पर हुए अत्याचार की बात भी मानता हूँ मैं, उन्हें उनके सही हक़ से दूर रखने की बात का भी समर्थन करता हूँ मैं.
लेकिन मैं पूछता हूँ, की क्यूँ सहते रहे हम ज़ुल्मो सितम जब रास्ते और भी हैं. मैं इस बात को नहीं मानता की नारी कमजोर है. अगर आप पर अत्याचार हो रहा है तो विरोध करें. लोग कहते हैं की हर नारी काली नहीं बन सकती. मैं पूछता हूँ क्यूँ नहीं बन सकती? उन्हें इतिहास का एक उदहारण दे दूँ; कलिंगा पर जब अशोका ने हमला किया था तो, वहां की स्त्रियाँ ही थीं जिन्होंने उनको भारतीय स्त्री के शक्ति का एहसास कराया था.
भारत, आर्यावर्त या हिंदुस्तान जो भी नाम लें आप, स्त्री शक्ति के इस देश में जहाँ स्त्री हमेशा पूजनीय रही, ये अचानक से बदलाव कैसे और क्यूँ आया? क्या स्त्री दोषी नहीं? इस कलयुग में अगर आपको जीना है तो खुद को सबल बनाना पड़ेगा. रोने की बजाय अगर तलवार उठा कर अत्याचार का सामना करें. और अगर आप विरोध नहीं कर सकते और लड़ नहीं सकते तो मौन हो अत्याचार सहें.
आज बहुत सी चीजों को बदलने की जरुरत है. लेकिन हम क्या करें, हम इन्सान हैं, हम जैसे हैं वैसा ही सोचते हैं. एक सोच मन में आई और उस सोच को सच मान कर पूरी दुनिया को उसी सोच के साथ देखना शुरू कर देते हैं. नारी के विषय में जब बात छिड़ी है तो मैं आज समाज को एक और सच से अवगत करना चाहूँगा.
बहुत पीछे जाने की जरुरत नहीं है, मैं पिछले ३०-४० वर्षों के इतिहास को खंगाल रहा हूँ. बात शुरू करना चाहूँगा, स्वतंत्र भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री, स्वर्गीय इंदिरा गाँधी जी से. जिन्हें भारत की प्रथम महिला प्रधान मंत्री बनाने का गौरव प्राप्त हुआ; पंडित जवाहर लाल नेहरु, एक पुरुष की बेटी थीं वो. जेल की चारदीवारी में बंद होने के बावजूद, जिसने उनका मार्गदर्शन अपने लिखे अविस्मरनीय और प्रोत्साहित करने वाले पत्रों से किया, वो भी एक पुरुष ही था.

किरण बेदी, भारत की अद्वितीय पुत्री, क्या उन्होंने अपने लेख में ये कभी लिखा की उनके पिता ने उनके पढने पर पाबन्दी लगाई थी, या फिर कल्पना चावला जिसने अंतरीक्ष के सीने पे भारतीय नारी के विजय की पताका फहरायी थी, क्या कभी उनके पिता ने उनके विजय अभियान में रुकावट बनने की कोशिश की?
हमें आदत हो गयी है, सिर्फ विकृतियों को देखने की. आदत सही भी है, लेकिन उस विकृति के कारन को जाने बिना पुरे समाज पर उसका कलंक मढ़ देना कहाँ की चतुराई है?

मैं भयभीत हूँ, भयभीत हूँ मैं उन बुद्धिजीवियों से जो नारी का पक्ष लेने की बात करते हैं. जो बात करते हैं नारी पीड़ा की, पक्ष धरते हैं उनको बल देने की और अपने इस प्रयास में जाने-अनजाने, नारी और पुरुष दोनों के मन में नफरत के बीज बो रहे हैं. जहाँ तक रही मेरी बात, तो मैं न पुरुष हूँ, न महिला; मैं इंसान हूँ, वो इंसान जिसे इश्वर ने प्रेम का पाठ पढ़ने के लिए पैदा किया.

मैं समाज के हर व्यक्ति से ये आग्रह करूँगा की, समाज की कुरीतियों का विरोध अवश्य करें. महिलाओं को सम्मान दें, क्यूंकि हम भारतवर्ष के वासी हैं, और हमारे देश मैं नारी, पत्नी नहीं माँ है. लेकिन कुछ विकृत मानसिकता के लोगों द्वारा किये गए कुकृत्यों को पुरे समाज से जोड़ कर न देखें. ये औरत और नारी के संबंधों में एक ऐसी खाई ले आएगा जिसे पाटना मुश्किल हो जाएगा. समय रहते हम अभी न चेते तो वो दिन दूर नहीं जब दुनिया में एक तीसरी जमात खड़ी होगी जो न पुरुष होगा और न नारी.
नारी को पुरुष और पुरुष को नारी न बनाएं, दोनों एक दुसरे के पूरक हैं; इन्हें पूरक ही रहने दे, दुश्मन न बनाएं.

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315 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nikhil के द्वारा
June 19, 2010

हर किसी को झाँसी की रानी और किरण बेदी बनाने की जरुरत नहीं. लेकिन अपने-अपने क्षेत्र में हर नारी, सफलता और साहस के हिमालय पर आरोहन तो कर ही सकती है. मैं इस बात से कभी सहमत नहीं हो पाऊंगा की हर औरत में उड़ान भरने का दम नहीं होता है, दम होता है, लेकिन उसके लिए हौसले की जरुरत है. वैसे भी ‘ मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंख से नहीं हौसलों से उड़ान होती है’. बिना पंख पसरे आसमान की ऊंचाई कैसे नाप सकता है कोई.

rajkamal के द्वारा
June 18, 2010

किरण बेदी को पहले अमेरिका में सन्मान मिला था … तब बाद में हमने उनको माना और पहचाना… लेकिन इस के बावजूद उन की पोस्टिंग में जो भेदभाव किया गया… इनको दुसरो विभागों में ट्रांसफर किया गया…. बाहर वाले चाहे कदर करे हम फिर भी नहीं जागते है… हमारा सिस्टम ही ऐसा है… अब हर किसी को बाहर वाले पहले हमको बताए.. तब हम उसको माने… यह बात सिर्फ औरतो पर ही नहीं मर्दों पर भी लागु होती है… यह सभी जानते है की सदी का महा नायक अवार्ड/ naam अमित जी को किसने दिया.. और तब हमने उनको दुबारा उनका खोया हुआ सन्मान दिया… और कपिल देव को फिक्सिंग से बाहर किस चीज ने किया… हमने भी तब माना जब इंग लैंड ने महान आल राउंनडर बाताया… वर्ना बेचारे कपिल जी शायद सुसाइड ही कर लेते … और अमित जी ऐश की बने हुई रोटिया घर पर खा रहे होते…. हम भी क्या करे .. हमारे चश्मे का नंबर ही गलत है…

    Nikhil के द्वारा
    June 19, 2010

    अब जरुरत है इस बात को बदलने की. और इसका बीड़ा हमें ही उठाना पड़ेगा राज्कमल्जी. लेख पर प्रतिक्रिया देने के लिए आभार.

    Jera के द्वारा
    July 12, 2016

    skriver:Hej Sofia. MÃ¥nfaserna spelar roll. Ny/¥nÃemfullmÃ¥ne brukar kunna överraska med stora fiskar. . . . Ibland.Jo det är en ganska cool konstform faktiskt. Men sÃ¥g även att du börjat flugfiska. Kul. Hoppas du lyckas landa nÃ¥gon blanking i vÃ¥r .

aditi kailash के द्वारा
June 18, 2010

निखिल जी, सबसे पहले तो आप अपनी आँखों का चश्मा उतार लें और ये समझ ले की मेरी वो रचना पुरुषों के खिलाफ कतई नहीं है, ये उन दरिंदों के खिलाफ है जो नारी को भोग-विलास की वस्तु समझते हैं…क्यों आप जैसे कुछ लोग अगर एक नारी, नारी की व्यथा बताना चाहती है तो उसे गलत रूप में ही लेते हैं…..मेरा उद्देश्य विष के बीज बोना नहीं है…..इसे आप इस तरह समझ सकते हैं, BPO में कार्यरत लोगो को क्या समस्याएं हैं इसे वो ही लोग अच्छी तरह समझ सकते है, तो अगर वो उस समस्या को सब के सामने रखेंगे तो हम ये तो नहीं कहेंगे ना की वो अपना रोना रो रहे है या वो bais है….. अब मैं पहले अपनी बात करती हूँ….मेरे साथ भी एक बार ट्रेन में चढ़ते समय ऐसे ही एक दरिन्दे ने बदतमीजी करने की कोशिश की थी…..हमने भी उसे ऐसा जोर का झापड़ लगाया था कि जिंदगी में अब किसी लड़की को छेड़ने से पहले हजार बार सोचेगा….पर सभी हमारे जैसे नहीं होते हैं…..और सभी इतनी हिम्मत नहीं कर पाते हैं…..हमारे आगे-पीछे के लोग देख रहे थे पर किसी में इतनी ताकत नहीं थी उसका विरोध कर सके…. आप पूछ रहे थे ना कि क्या कोई इन्सान ४-५ साल की बच्ची का बलात्कार करेगा, क्या कोई इंसान ६५ साल की प्रौढ़ा का दामन तार तार करेगा; तो जरा इस डाटा पर गौर फरमाइए….भारत में १९७१ से लेकर २००६ के बीच बलात्कार कि संख्या में 678 % कि बढोत्तरी हुई है….ये तो हैं सरकारी रिकार्ड, हजारों केस तो ऐसे है जिनकी कुछ सामाजिक कारणों से पुलिस में शिकायत ही दर्ज नहीं कराई जाती है….इनमें से बलात्कार के ७५% केस ऐसे हैं जिसमे अपराधी पीड़ित का जान-पहचान वाला होता है……और १०% तो रिश्तेदार ही होते हैं…….और लगभग २५% पीड़ित नाबालिक होते हैं…..आप अगर जानना चाहे तो मैं उम्र वार भी आपको डाटा देने की कोशिश करुँगी….. भगवान ने नारी को इस तरह बनाया कि उसमें शायद कुछ ज्यादा ही सहन शक्ति दे दी है…..तब तक सहती है जब तक सह सकती है…..पर जब अति हो जाती है तो काली बनने से भी नहीं घबराती है……सही कहा आपने हमारे देश में झाँसी की रानी और किरण बेदी जैसी बहादुर नारियां पैदा हुई है….सही है, पर सभी तो नहीं बन सकती ना…और हमारे सामाजिक बंधन उन्हें बनने नहीं देता….और जो बनती है पहले उनके ऊपर भी उंगलियाँ ही उठाई जाती है….. इस रचना का उद्देश्य आँसूं बहाना या नारी को अबला साबित करना नहीं है, बस नारी कि व्यथा बताने कि कोशिश है…और एक बात और समझ लें, सभी का सोचने का तरीका अलग-अलग होता है, किन्ही भी दो व्यक्ति के विचार एक जैसे नहीं हो सकते ….. तो अगर कोई आपके विचारों से विपरीत सोच रहा है तो उसे दोष देना छोड़ दे………… और किसी अन्य के पोस्ट पर किसी का नाम लेकर प्रतिक्रिया करना छोड़ दे…….. और आप खुद शांत बैठ कर सोचे कि विष बोने की कोशिश कौन कर रहा हैं……

    Nikhil के द्वारा
    June 18, 2010

    अगर आपको किसी बात का बुरा लगा तो माफ़ी. लेकिन अगर आप उत्पीडन की बात कर रही हैं, तो ये सिर्फ नारी को सहना नहीं पड़ता, जिस विकृत मानसिकता के व्यक्तियों की बात आपने भी की और मैंने भी की, वो बीमार हैं; उनके लिए क्या पुरुष क्या नारी. आप आंकड़ों की बात कर रही हैं, मैं जानना चाहूँगा की क्या लड़के इस तरह के परिस्थिति से नहीं गुजरते. मैं बता दूँ की, हर चौथे पुरुष को मैं जनता हूँ, वो इस तरह के बीमार जानवरों से मिल चूका है. गलती उन्होंने भी की उस जानवर के खात्मे की कोशिश नहीं की उन्होंने. बात मन मैं ही रख कर, खामोश ही रहे. हो सकता है आपको इसका डेटा न मिले, क्यूंकि ये शायद दर्ज नहीं हुए. मैंने आपका नाम लिखा, माफ़ी. मेरा उद्देश्य आपको चोट पहुँचाने का नहीं था. और एक और बात. ये मंच सिर्फ समस्या को लिखने के लिए ही नहीं है. उसपर बहस तो होनी ही चाहिए. बहस के साथ साथ सार्थक कदम भी उठाना चाहिए हमें. मैंने किसी पर दोषारोपण नहीं किया है. जिहें आप जानवर कहती हैं उन्हें मैं भी वेहाशी बोल रहा हूँ. शब्दों का फेर है. आभार, निखिल झा

    Nikhil के द्वारा
    June 18, 2010

    आप जैसी हैं मैं चाहूँगा हर महिला वैसी बने. उर्जा और शक्ति से भरपूर, मन मैं दुनिया जीतने का साहस. लेकिन उसके लिए इन्कलाब चाहिए और वो इन्कलाब आप को ही लाना है.

allrounder के द्वारा
June 18, 2010

यार निखिल मुझे नहीं मालूम तुमने कहाँ से प्रेरणा लेकर ये लेख लिखा वो कौन थी उससे या किसी और से मगर सच कहता हूँ, तुम्हारे इस लेख मैं एक ज्वाला है जिससे नारियों को सबक लेकर ज्योति जलाना चाहिए! तुम्हारा एक – एक शब्द मोतियों की तरह एक माला मैं पिरोया हुआ लगता है ! मैं आज तुम्हारी कलम का कायल हो गया भाई !

    Nikhil के द्वारा
    June 18, 2010

    हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया allrounder भाई. मैं कई दिनों से जागरण के इस मंच पे बेतुकी बातों पे हुए घमासान को देखता आ रहा हूँ. आजतक कोई भी सशक्त मुद्दा यहाँ लोकप्रिय होता नहीं देखा मैंने. लोकप्रियता के खेल में, सारे तर्क-वितर्क भूल कुछ भी लिखने का सख्त विरोधी रहा हूँ मैं. लेकिन आज मुझसे रहा नहीं गया और दिल की ज्वाला शब्द बन कर निकल ही गए. अहोभाग्य मेरे की आप जैसे मंझे हुए ब्लॉगर ने मेरी लेखनी के कायल होने की बात कही. आपका बहुत बहुत धन्यवाद. निखिल झा

    Travon के द्वारा
    July 12, 2016

    Of course people want to make it…..What about the trolls and ogres in the game? The ratongas and their hovels? Just because one person finds it distasteful, doesn’t mean that an entire game worth of folks do. There’s plenty of &#2dg6;1oo2ie≱ decorating ideas out there, it’s nice to have some stuff that’s a little gross for the less cultured races.


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