मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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इमोशनल अत्याचार (हास्य-व्यंग्य)

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जैसे ही जवानी की गाडी में सवार हुए, नज़रें चार करने की हमारी इक्षा का संचार हमारी रगों में बैक्टीरिया बनकर दौड़ने लगा. जब भी बाज़ार निकलते, या मंदिरों में जाते, स्वप्न्सुन्दारियों की तलाश में निगाहें भटक ही जाती थीं. इंतजार का दौर ज्यादा लम्बा नहीं रहा, सब्जी लेने के लिए बाज़ार गए वही उस कातिल अदाओं के दर्शन हो गए. देखते ही दिल में बाल्टी भर-भर के प्यार आने लगा. मन ही मन उस हसीना के हुस्न की तारीफ करने लगे. बोला कुछ नहीं, डरते थे, प्यार के बदले मार न पड़ जाए. अब उपाय तो कोई ढूँढना ही था हसीना के दिल में जगह बनाने को. उस सुन्दर बाला की नज़रों से बचते हुए उसके पीछे हो लिए. ससुराल का पता जानने का तो हक़ बनता था अपना. हिरनी सी चाल से चलते हुए, मेरी सपनों की रानी ने अपने घर के गेट को खोला और मेरे प्यार की गाडी पर ब्रेक लगाते हुए अन्दर चली गयी.

हम भी कहाँ हार मानाने वाले थे. घर पहुंचते ही दोस्तों को उसके बारे में बताया. अब दोस्त तो होते ही हैं लव गुरु. सो सबने अपने-अपने सुझाव मेरे सामने प्रस्तुत कर दिए. सुझावों की फेहरिस्त इतनी लम्बी हो गयी, याद करना मुश्किल हो गया.
इतने सारे सुझाव तो आज तक संसद भवन भी नहीं पहुंचा. लगता है आज का दिन हमारे लिए ख़ास है. तभी तो सुझावों के मामले में हमने वर्ल्ड रिकॉर्ड बनते हुए देखा. दोस्तों से उनके विचारों को लिख कर छोड़ जाने को बोला. सोचा पढ़ कर देखेंगे कौन सा सुझाव टांका फिट करने में काम आएगा. सुझावों में से अपने लिए लाभदायक मंत्र का चुनाव करने में हमें ज्यादा देर नहीं लगी. हमारे एक मित्र ने उस अनुपम सुंदरी का मोबाइल नंबर और नाम कागज़ पर लिख छोड़ा था. हमने सुंदरी को फोन लगाने से पहले अपने लव गुरु का नंबर डायल किया. पूछने पर पता चला की मेरी फुलझरी उनकी पड़ोसन है. हम तो फुल के गुब्बारा हो गए. खोजा पहाड़ मिला हिमालय, हमने टकाटक अपनी प्रेम की कथा लिखने की तयारी शुरू कर दी.

“हेल्लो, आप बहुत खुबसूरत हो. आपको बाज़ार में सब्जी खरीदते देख अपना दिल हार गए हम”, हमने प्यार के मैदान पर बैटिंग शुरू की.
हमारा तो मन किया की आपकी तस्वीर को अपने पूजाघर में लगा कर, सुबह-शाम आपकी आरती उतरून. लेकिन क्या करता, आँखों के कैमरे से ली हुई तस्वीर कागज़ पर नहीं उतरती. आपने जब टमाटर खरीदा, हाथों से उसको छुआ, मन किया टमाटर बन जाऊं . आपके कोमल हाथों में आकर आपको दिल की बात बताऊँ. मेरे हर शब्द पे हमारी बिल्लो का हँसना, मेरे दिल में हारमोनियम बजा रहा था. हँसते-हँसते उन्होंने मिलने की बात कह दी. कहा दुर्गा रेस्तरां में आईये, वहीँ दिल के तार छेड़ेंगे. हमने मन ही मन अपने सेंचुरी पर खुद की अपनी पीठ ठोंक अपना हौसला बढाया. अब पहले दिन का खेल समाप्त होने की बारी थी. अपने बैट, मेरा मतलब अपने मोबाइल को अपनी जेब में रख हम खाना खाकर सो गए. सपनो में भी ज़ालिम ने पीछा नहीं छोड़ा. आनेवाले कल की बात से मन में एक साथ दो-दो लड्डू फुट रहे थे.

“हाय जान, कैसी हो? आज तो करीना कपूर लग रही हो. देखना कहीं पूरा दरभंगा तुम्हारे पीछे-पीछे, मेरे ससुराल न चला जाये”, स्ट्राइक सँभालते ही पहली बाल पर चौका मरने का प्रयास किया हमने.
हमारी जान ने स्लो बाल डाली और कहा की मुझे देख कर बस मुझे ही देखते रहना चाहती है. बातों और इज्हरों का दौड़ शुरू हुआ. बातें करते-करते उनकी निगाह घडी पर गयी. लेट होने की बात कह वो जाने को उठी. मैंने घडी बनाने वाले वैज्ञानिक को जमकर गालियाँ दी. जब बिल की बारी आई, जेब में हाथ डाला तो हजार रूपये थे. सोचा ३००-४०० में कम बन ही जाएगा. महंगे रेस्तरां में खाने का हमारा पहला अनुभव था. अपने जानेमन को रिक्शे पे बिठा हम काउंटर पर वापस आये. बिल देखते ही माथे पे पसीना आ गया. १५०० रूपये. किसी तरह कल दे जाने की बात कह हम वहां से निकले. प्यार का बुखार चढ़ा ही था सो महंगाई का ख्याल दूर-दूर तक नहीं था. धीरे-धीरे मुलाकातों और बातों का सिलसिला बढ़ता गया.
हर दुसरे दिन, मोबाइल रिचार्ज करना पड़ता था. बिल्लोरानी को हमसे बात किये बिना नींद नहीं आती थी. फ़ोन नहीं करने पे उनका इमोशनल अत्याचार शुरू हो जाता.
“तुम्हें पता है कितना मिस किया तुम्हें मैंने. तुम्हें मेरी बिलकुल परवाह नहीं. तुमतो मुझसे प्यार ही नहीं करते. जाओ में तुमसे बात नहीं करुँगी”, एक दिन फोन क्या नहीं किया, सुंदरी ने गुस्से में फोन काट दिया.
मन ही मन सोचा, फोन कर ही लेता तो अच्छा था. महंगाई की मार से पीड़ित अब हो ही चूका था. इस बात की चिंता सताने लगी की मानाने में १०० का रिचार्ज और प्यार की बात करने के लिए १५० का रिचार्ज. शनिवार को डेट पर भी जाना है. पॉकेट की तो बैंड पहले ही बजी हुई थी. दोस्तों से पैसे उधार लेकर मैडम के गुस्से को शांत किया. मन ही मन उस दिन को कोस रहे थे जब उनके दर्शन हुए थे. न बात होती, न मुलाकात होती, न उधारी के पहाड़ तले हम दबते.

इतना सब मैं इस लिए कह रहा हूँ की मेरी इस तपस्या का फल मैडम ने कुछ इस अंदाज़ में दिया की हमें लगा हम इमोशनल फुल हैं.
आखरी बार फोन पर बात करते हुए मेरी सपनो की रानी ने कहा की मेरे कम फोन करने और मेरे कम मिलने से उनके दिल की पीड़ा बढ़ गयी है. मेरा दोस्त, जिसने उनका नंबर मुझे दिया था, वो मुझसे अच्छा है. उसकी बहुत केयर करता है. हमारा तो दिल ही बैठ गया. आने वाले खतरे को पहले ही भांप हमने पूछ डाला, कहीं तुमने रोंग नंबर तो डायल नहीं कर दिया.
मैडम तुनक कर बोली, “तुम्हारी बैटिंग में अब पहले वाली बात नहीं रही. बात-बात पे रन-आउट हो जाते हो. आज एक युवा खिलाडी की जरुरत है मुझे और तुम तो रिटायर होने के कगार पर हो”
घोर अपमान! इमोशनल अत्याचार के इस खेल में हम स्टंप हो गए. कसम खायी की प्रेम के गीत गाने की गलती अब दुबारा नहीं करेंगे. राजेश खन्ना की फिल्में देखना छोड़ हमने अमरीशपुरी की तरफदारी शुरू करदी.

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1167 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Boog के द्वारा
    July 12, 2016

    Huhhu mikä homma kelata kaikki kommentit alas, meinasin jo luovuttaa. :) 1. Toivottavasti ei ainakaan kovin paljon vanhempi, kuin sen olmusssaoloveoaien lukumäärä.2. Kaukana kehä kolmosesta, mutta ympärilläni tietysti sädehtii luontainen sädekehä. :) 3. En sitten ikinä.4. Kaippa se laatu sitten.5. Yritän pusertaa opiskeluja eteenpäin.6. Musta on yleensä valkoista parempi vaihtoehto.

Spike के द्वारा
May 24, 2011

At last! Someone who understands! Tahkns for posting!

Raj के द्वारा
July 20, 2010

व्यंग्य बहुत बढ़िया है भविष्य के अमरीश पुरी, आप से आग्रह है कि आप द से देवदास न बनियेगा हमें च से चुन्नीलाल को च से चिराग़ लेकर ढूँढना पड़ेगा । राज

    Nikhil के द्वारा
    July 20, 2010

    अरे घबराइए नहीं र से राज बाबु, हम न से निखिल ही रहेंगे क्यूंकि हमें क से कई काम करने हैं. आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. और यूँही प्रोत्साहन करते रहिये. आभार, निखिल झा

    Jacki के द्वारा
    July 12, 2016

    I’m quite pleased with the iniarmotfon in this one. TY!

aditi kailash के द्वारा
June 20, 2010

क्या बात है, किसने आप पर इमोशनल अत्याचार कर दिया…….

    Nikhil के द्वारा
    June 20, 2010

    हमपे तो किसी ने नहीं किया अदितिजी हम इतने खुशनसीब कहाँ. हमारे कई मित्र हैं जो इमोशनल अत्याचार के कारन आज देवदास बने हुए हैं, हमने तो उन्ही की व्यथा सुने. प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

NIKHIL PANDEY के द्वारा
June 20, 2010

वाह क्या बात है …बहुत बढ़िया मजा आया पढ़कर .आप तो व्यंगकार भी है कवि भी है बढ़िया लिकते है निखिल जी….

    Nikhil के द्वारा
    June 20, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद निखिलजी. हम न तो कवि हैं न व्यंगकार, हम तो बस एक आम इंसान हैं जो दिल की बातें लिखता है. आभार, निखिल झा

sumityadav के द्वारा
June 20, 2010

झकास व्यंग्य निखिलजी, वैसे भी आज के जमाने प्यार हो न हो इमोशनल अत्याचार जरूर है। हम भी भुक्तभोगी हैं इस तरह के इमोशनल अत्याचार के। अपने इमोशनल अत्याचार से आपको अपनी रचना के जरिए फिर कभी  रूबरू कराएंगे। मनोरंजक रचना के लिए बधाई।

    Nikhil के द्वारा
    June 20, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद सुमितजी. इमोशनल अत्याचार का भुक्तभोगी नहीं, हाँ प्रत्यक्षदर्शी ज़रूर रहा हूँ. आपके इमोशनल अत्याचार रचना का इन्तेजार रहेगा. आभार, निखिल झा

    Kert के द्वारा
    July 12, 2016

    Håller med alla som skriver gulliga och positiva tillrop till dig idag, Philia! Det är verkligen med glädje och fätvönran man hoppar in på din blogg!!!! Ha det gott Maria i Smalltown;)

sushma के द्वारा
June 20, 2010

nikhil badhai is hasya k liye.

    Nikhil के द्वारा
    June 20, 2010

    लेख पढ़कर प्रोत्साहित करने के लिए धन्यवाद सुषमा जी. आभार, निखिल झा

kmmishra के द्वारा
June 19, 2010

सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते हैं । अच्छा लिखा है ।

    Nikhil के द्वारा
    June 20, 2010

    धन्यवाद मिश्राजी. आपके व्यंग्यों से बहुत कुछ सिखा है. आभार, निखिल झा

    Rena के द्वारा
    July 12, 2016

    whoah this blog is exlelcent i like reading your articles. Stay up the great work! You know, a lot of people are looking round for this info, you can aid them greatly.

chaatak के द्वारा
June 19, 2010

वाह ! निखिल जी, आपका हास्य व्यंग तो सुभानअल्ला | क्या आपबीती सुनाई है | राजेश खन्ना से कल्टी मार के अमरीश पुरी की पार्टी में आने का अंदाज़ बढ़िया लगा |

    Nikhil के द्वारा
    June 19, 2010

    लेख पसंद करने के लिए धन्यवाद चातक जी. क्या करें, कभी-कभी हम भी इमोशनल हो जाते हैं. अपने इमोशनल अत्याचार की व्यथा हमने आपके समक्ष रख दी. आभार, निखिल झा

    Fanni के द्वारा
    July 12, 2016

    THERE ARE A NUMBER OF EXCERPTS FROM THIS NEW BOOK THAT HAVE BEEN BROADCAST ON THE CABLE NEWS SHOWS, AND THOSE EXCERPTS AREN’T PRETTY. Keith Olberman, whose show I like, blasts away. Rachel Maddow, another talk show person, gives a great peirpectsve on the book as well. The most damning passages, which will get the most airtime when the text is fully released, were out on Monday, 5/26/08.

allrounder के द्वारा
June 19, 2010

यार इतनी जल्दी हार मानके हमपर ये इमोशनल अत्याचार न करो ! हम बरात मैं कैसे जायेंगे तुम्हारी ? मस्त व्यंग !

    Nikhil के द्वारा
    June 19, 2010

    आपने देखा नहीं allrounder भाई, इसमें इमोशनल फुल बनाने की बात कही गयी है. हम आपको कहीं से इमोशनल फुल लगते हैं. हम टेस्ट मैच नहीं २०-२० खेलते हैं. घबराइए नहीं, इस दुल्हे बारात में बैंड आपको ही बजाना है. लेख पढ़कर प्रोत्साहित करने के लिए धन्यवाद. आभार, निखिल झा


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