मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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जागरण पर गधे.. पर क्यूँ? ये आप कहने वाले कौन हैं?

Posted On: 26 Jun, 2010 Others में

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मन बहुत आहत है और विचलित भी. क्रोधित भी हूँ. लेकिन बापू के पढाये पाठ को अभी तक नहीं भुला हूँ. इसीलिए मैंने सोचा की जब बापू ही कह के गए हैं, जब आप किसी के बात से सहमत न हों और आपको लगे की गलत हुआ है, तो आवाज़ उठाइए.उनका अनुशरण करने वाला मैं कैसे चुप रहता. मैंने शुरू तो किया पढना ‘जागरण पर गधे क्यूँ’ से लेकिन फिर, भारतीय साहित्य के महानायक द्वारा रचित, दुसरे पुरानों को भी पढ़े बिना मन नहीं माना.
वैसे तो इनकी रचना मैंने इससे पहले कभी नहीं पढ़ी थी, क्यूंकि राजकमलजी द्वारा लिखित एक ब्लॉग मैं उन्होंने इन्हें एक स्थापित उपन्यासकार बताया था. चूँकि आधुनिक युग के उपन्यासकारों के उपन्यास मेरी पसंद नहीं हैं सो मैंने इन्हें कभी नहीं पढ़ा. आज अचानक जागरण के होमपेज पर उनकी प्रतिक्रिया देख कर मैं उन्हें पढने को उत्सुक हो गया. पढ़ा शुरुआत बहुत अच्छी रही, लेकिन अंत बहुत ही दुखद और दंभ में भरे हुए शब्दों के साथ हुआ. मैं इसलिए आहत नहीं हूँ की इन्होने जागरण के लेखकों को गधा कहा, जिन लोगों को इन्होने गधा कहा उनमें से एक मैं, सच मैं गधा हूँ. मुझे साहित्य का जरा भी ज्ञान नहीं. आजतक पहली कक्षा लेकर प्रतिष्ठा करने तक मैंने हिंदी विषय की पढाई नहीं की. तो मैं तो गधा हूँ ही. लेकिन इस मंच पर कई ऐसे रचयिता हैं जिन्हें साहित्य की बहुत गहरी समझ है और वो सृजनकर्ता हैं. इनके सारे पुरानों को पढ़ने के बाद, मन और भी दुखी हो गया. काश इतने प्रशंशक हमारे नागार्जुन बाबा को मिले होते तो आज साहित्य का ये हाल नहीं होता. काश मेरे प्रेमचंद को भी कोई पढ़ता तो आज उनके बच्चे यूँ गुमनाम न होते.
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब मैं सक्सेना साहब का ब्लॉग पढ़ रहा था. वहां भी श्रीमान, पूजनीय बच्चन साहब पर ऊँगली उठाते दिखे. शायद बड़े और महान लोगों पर प्रहार करना इनकी आदत में शुमार है. इसीलिए बाबा रामदेव को भी निशाना बनाया इन्होने. मैं योग का विद्यार्थी नहीं हूँ, न ही बाबा रामदेव मेरे गुरु हैं. बाबा रामदेव के सौ अवगुण हो सकते हैं, ऐसा मानता हूँ मैं. लेकिन योग और आयुर्वेद में उनके अतुलनीय योगदान को नाकारा नहीं जा सकता. इन्होने पतंजलि योग केंद्र की बात की. हमारे छोटे से शहर मैं भी है यह केंद्र. यहाँ के लोगों के पास न धन है, न पहुँच, फिर भी उनका उपचार किया जाता है वहां. मैं फिर से अपनी बात दोहराना चाहूँगा. आपके एक खट्टे अनुभव को आप अगर स्वयं तक सीमित रखते हैं तो ये आपकी महानता है. लेकिन आपके एक खट्टे अनुभव को अगर आप अपने शब्दों की जादूगरी से लोगों तक पहुंचाते हैं तो इससे कई भ्रांतियां पैदा हो जाती हैं. आपका पतंजलि योग का अनुभव बुरा हो सकता है. लेकिन आपके अलावा हिंदुस्तान की १०० करोड़ आबादी बेवकूफ है ऐसा साबित करना कहीं से श्रेष्ठता नहीं है.
हाँ मैं गधा हूँ, क्यूंकि मुझमे गलत को सहने की शक्ति नहीं. किस मी और किल में, बहुत अच्छा टोपिक है. बहुत लोकप्रिय भी. लोगों को इसका बेसब्री से इन्तेजार है. मैं भी इन्तेजार करता, अगर भारत के विदर्भ की कहानी का चित्रण किया होता इन्होने.ये मेरा निजी मत है. आप उपन्यासकार हैं, अच्छा लगा सुनकर, इश्वर से प्रार्थना करूँगा की आपको उन्नत्ति मिले. लेकिन दंभ में आकर लोगों को नीचा दिखाना छोड़, साहित्य के सृजन में ध्यान लगायें तो शायद अगली बार आप पर कोई उंगली नहीं उठाएगा.

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55 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Gerry के द्वारा
July 12, 2016

Zajímavý názor. Nikdy mÄ› nenapadlo se dívat na bisexualitu jako na nutnost takovéhle rovnováhy.Do jmenované diskuze jsem se také vyjádÅ™ila. Bohužel ne za zcela střízliva. Teď (ne že by se nÄ›co zm-iv›loÄníno je zdravé) bych se vyjádÅ™ila parafrází nevadil by mi sex s mužem, ale plnohodnotný vztah ne. Že by homosexuál s otevÅ™enou myslí, nebránící se zmÄ›nÄ›? ;) Možná se jen mé podvÄ›domí nedokáže stále zbavit pocitu viny ze zklamání, které působím rodinÄ›.

    Jaylynn के द्वारा
    July 12, 2016

    Hi, Neat post. The71&#82er;s an issue together with your website in internet explorer, might test this… IE still is the market chief and a big part of other people will pass over your magnificent writing due to this problem.

Hallie के द्वारा
May 25, 2011

Good to see a tlanet at work. I can’t match that.

    Gerri के द्वारा
    July 12, 2016

    Some people are born slaves. If they’re not slaves to an individual, they enslave themselves to something else &#g*o0;2c3u8h* is False Idols redundant?Give them credit, the Democrat Party was born exploiting slavery and has successfully played the race card for 200 years, first from one side, now from the other.

Liza के द्वारा
May 24, 2011

Fell out of bed feielng down. This has brightened my day!

    Teiya के द्वारा
    July 12, 2016

    / I was very pleased to find this website. I wanted to thank you for your time for this wonderful post!! I deletinify enjoy reading it and I have you bookmarked to check out new stuff you blog post.

Ashutosh "Ambar" के द्वारा
June 28, 2010

निखिल जी ये आप किस व्यक्ति के विषय में बात कर रहे हैं / ये तो मुझे नहीं पता / पर आपने बहुत ही अच्छा प्रहार उन मूर्खो पर किया है /जो विना सोचे – समझे प्रतिष्ठित व्यक्तियों पर व्यंग करते हैं /

    Nikhil के द्वारा
    June 28, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद आशुतोष जी, मैं इस ब्लॉग के माध्यम से बस इतना कहना चाहता था की औरों पर ऊँगली उठाने से पहले ये देख लें की आपका दामन कितना साफ़ है.

    Esther के द्वारा
    May 24, 2011

    Haha. I woke up down today. You’ve ceheerd me up!

Ashutosh "Ambar" के द्वारा
June 28, 2010

निखिल जी ये तो मुझे भी पता नहीं की वो कौन थी पता कर रहा हूँ / पता लगते ही बताउगा निखिल जी प्रतिक्रया के लिए बहुत – बहुत धन्यवाद बाद

    Nikhil के द्वारा
    June 28, 2010

    आपका स्वागत आशुतोष जी. आपके उत्तर का इन्तेजार रहेगा मुझे.

    Blaze के द्वारा
    May 24, 2011

    Didn’t know the forum rules allowed such brillaint posts.

parveensharma के द्वारा
June 27, 2010

निखिल जी. jagranjunction पर ये जो कुछ हो रहा है, वो दुर्भाग्यपूर्ण है. मुझे लगता है की गधे जैसे निरीह प्राणी को हम बेवजह ही jagranjunction पर घसीट रहे हैं. आओ गदर्भ राग बंद कर प्यार और प्रीत का राग शुरू करें.

    Nikhil के द्वारा
    June 28, 2010

    प्रवीण जी, मैं आपकी बात से सहमत हूँ, मेरे लिखे ४५ ब्लोगों मैं कभी किसी से कोई द्वेष नहीं दिखाया है मैंने. ये तो बस कुछ ऐसी बात थी जो मुझे अच्छी नहीं लगी. और प्रेम तो हम भारतियों के कण-कण मैं बसा हुआ है, छह कर भी उससे अलग नहीं हो सकते, हुए तो भारतीय कहलाने का हक़ खो देंगे. आभार, निखिल झा

    Jane के द्वारा
    May 24, 2011

    This has made my day. I wish all poitsngs were this good.

deepaksrivastava के द्वारा
June 27, 2010

सादगी पूर्ण ढंग से आइना दिखाया अपने. अच्छा लेख. दीपक srivastava

    Nikhil के द्वारा
    June 27, 2010

    दीपकजी जागरण के इस मंच पर हम सब एक परिवार की तरह हैं और थोडा बहुत हंसी मजाक अच्छा लगता है, लेकिन एक साहित्यकार को ये शोभा नहीं देता की वो इस तरह से शब्दों का द्विअर्थक उपयोग करे और विवेकहीन प्रतिकिर्या दे.

chaatak के द्वारा
June 27, 2010

निखिल जी, आपका लेख पढने के बाद से मेरी धमनियों में खून ४ गुना तेज़ दौड़ रहा है | क्या धाँसू-धाँसू चीज़े दिमाग में आ रही हैं के तबियत हरी-पीली-लाल-नीली सब हो जाय बस वो ब्लॉग नहीं मिल रहा जिसकी चर्चा आप ने की | खोज रहा हूँ, आशा है जल्दी मिल जायेगा | क्या करूँ, मैं भी बापू महात्मा गाँधी का (फैन नहीं) ए सी हूँ ना !

    Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
    June 27, 2010

    प्रिय जागरण परिवार के माननीय सदस्यों मैं आप लोगों को ये बताना चाहूँगा की जैसा की मैंने वो ब्लॉग पढ़ा जिस पर चर्चा हो रही है उसका यु आर एल http://mihirraj2000.jagranjunction.com/2010/06/13/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%97%E0%A4%A7%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82%E0%A4%82/ इस लेख का टाइटल विवाद का कारण हो सकता है क्योंकि ये द्वि अर्थी है लेखिन लेख में ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए परेशां हुआ जाए. मैं आप लोगों से निवेदन करना चाहूँगा की पहले इस लेख को पूरा पढ़ लें, कृपया मेरी बात को अन्यथा न लें, मैं किसी की तरफदारी नहीं कर रहा, बल्कि मैं चाहता हूँ, क्रोध करने से पहले मामले को जानने का प्रयाश कर लें…….

    Nikhil के द्वारा
    June 27, 2010

    प्रिय शैलेश, पहले तो मैं आपको ये बता दूँ की यहाँ इस मंच पर सब एक हैं. लेकिन किसी की भी गलती को बख्शना हमें हमारा हिन्दुस्तानी लहू नहीं सिखाता, चाहे वो गलती किसी की हो. आपने लेख पढ़ा, मैंने भी पढ़ा. आपकी तरह मुझे भी लेख पसंद आया, मैंने अपने लेख मैं कहा है की शुरात बहुत अछि रही लेकिन अंत दंभ से भरे शब्दों से हुआ… इसके दो उदहारण पेश कर रहा हूँ. पहला लेख के आखरी वाकया से और दूसरा लेखक द्वारा अपने इसी लेख पर दिए गए प्रतिक्रिया से. फिर भी आपको लगे की मैंने कुछ गलत कहा तो माफ़ी चाहूँगा. १.“जागरण पर गधे. . पर क्यूं?” इस शीर्षक का रहस्य आप शायद समझ गए होंगे. २. जागरण पर गधे ही तो है जो एक दूसरो को नीचा दिखने को कुछ भी लिख रहे है. मेरे गधे इन से अच्छे है आकाश. मेरे गधो को न्याय मिले आशा कर सकते है.

    Nikhil के द्वारा
    June 27, 2010

    मैं जब लेख पढ़ता हूँ, हर शब्द पर गौर करता हूँ, शायद यही कारण है, की मुझे कुछ वो दिखा जो आपने नहीं देखा.

    Nikhil के द्वारा
    June 27, 2010

    चातक जी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. ब्लॉग का यु आर एल तो शैलेशजी ने दे ही दिया है. और जिन दो जगहों पर गधे शब्द के उपयोग से मुझे खेद है वो मैंने अपने पिछले कमेन्ट मैं दाल दिया है.

    Keiwan के द्वारा
    July 12, 2016

    Huhu le commentaire de Pasdbol. Ici Bébé ne se déplace pas en&80ec#o23r; Enfin, si, depuis quelques jours : sur le dos, elle lève ses fesses, pousse sur ses pieds, se traine sur la tête, et hop hop hop elle traverse le parc ou le lit en quelques secondes. 5 mois et demi. Ca promet.

Nikhil के द्वारा
June 27, 2010

प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद जून जी. हम हमेशा दूसरों पर उंगली तो उठाते हैं, लेकिन ये भूल जाते हैं की हम पर भी उंगली उठ सकती है.

    Dontarrious के द्वारा
    May 24, 2011

    Walking in the perescne of giants here. Cool thinking all around!

june के द्वारा
June 27, 2010

निखिल जी आपने बिलकुल सही आइना दिखाया की ये कहने वाले आप कौन? और बाबा रामदेव का मुद्दा भी बिलकुल सही है , दरअसल ये हमारे देश की सबसे बड़ी कमजोरी है की जब भी कोई नेक कार्य करता है तो लोग उसकी सराहना करने की बजाये उसकी आलोचना कर उसे हतोत्साहित करने की कोशिश करते है.

    Morey के द्वारा
    May 24, 2011

    That’s more than sesbnile! That’s a great post!

seema के द्वारा
June 27, 2010

निखिल जी मुझे यह नहीं पता की आप किसकी बात कर रहे हैं , लेकिन जो भी कहा , पढ़कर अच्छा लगा की अंतरजाल की दुनिया में जागरण मंच ही ऐसा देखा है जहां किसी भी रचना को अपनी रचना पर टिप्पणी बटोरने के चक्कर में बिना पढ़े सराहा नहीं जाता | आपकी रचना का सिरलेख देखकर तो मुझे लगा था शायद आप मेरी ही बात कर रहे है क्योंकि कल ही मेने गधों से सम्बंधित बाल-कविता पोस्ट की थी ,तो जल्दी से पढ़ने लगी और बात आपने किसी उपन्यास की की | प्लीज़ अगर आप उसका लिंक यहाँ लगा सकें तो समय मिलते ही मैं भी पढ़ना चाहूंगी | मैं ज्यादा समय नहीं दे पाती हूँ , इसलिए कौन सी रचना कब और किसकी पब्लिश हुई , ज्यादा नहीं जान पाती |

    Nikhil के द्वारा
    June 27, 2010

    आप ‘जागरण पर गधे.. पर क्यूँ’ ब्लॉग सर्च करें.. सीमा जी आप साहित्य की समझ रखती हैं, तो मुझे विश्वास है की बच्चन जी पर उंगली आप सपने मैं भी नहीं उठा सकती. साथ ही साथ मैं आपसे निवेदन करूँगा की मैंने एक उपन्यास लिखने की शुरात की है, पढ़ कर मेरी शुरात पर अपनी प्रतिकिर्या अवश्य दें.. आभार, निखिल झा

kmmishra के द्वारा
June 26, 2010

निखिल जी यह तो अपनी अपनी सोच है । आदमी जैसा अंदर से होता है वैसे ही उसके आचार, विचार, व्यवहार, लेखन सब में प्रदर्शित होता है ।

    Nikhil के द्वारा
    June 27, 2010

    अपने बिलकुल सही बात कही मिश्र जी. हम औरों को तो आइना दिखाते फिरते हैं लेकिन खुद माथे के घाव को नहीं देख पाते. आभार, निखिल झा


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