मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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नन्हीं और उसके चाचू!

Posted On: 11 Jul, 2010 Others में

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अभी-अभी मैं और मेरी छोटी सी गुडिया, मेरी भतीजी, भोजन कर के मेरे कमरे में आये हैं. मेरी और उसकी बहुत बनती है. ४ साल की मेरी भतीजी बहुत गुणवान है. बोलने में तो जैसे, पी.एच.डी कर रखा है उसने. नन्हीं (मैं प्यार से उसे नन्हीं बुलाता हूँ), और उसके चाचू (नन्हीं प्यार से मुझे चाचू बुलाती है), मैं बड़ा प्रेम है.
हमारे पुरे परिवार की जान नन्हीं मैं हैं. नन्हीं के चेहरे को जब अभी-अभी देखा तो, उसके कभी स्वयं से बिछर जाने की पीड़ा ने मन बेचैन कर दिया. जिसको देखे बिना मैं एक पल जीवित नहीं रह सकता, मेरी वो छोटी सी गुरिया कभी अपने चाचू की नज़रों से दूर चली जायेगी. मेरी गुरिया अपने पिता की ही एकलौती बच्ची नहीं, हमारे परिवार की एकलौती बच्ची है.
उसके बिना, घर कितना सुना हो जाएगा. आँगन जैसे, वीरान हो जाएगा.

तभी अचानक, एक शब्द, बहुत ही चर्चित शब्द, ओनर किलिंग की चोट ने मेरे ह्रदय को छलनी कर दिया. एक पिता अपनी पुत्री की हत्या कैसे कर सकता है?

नहीं मैं नन्हीं की हत्या कैसे कर सकता हूँ. क्या मनुष्य पागल हो गए हैं?

तभी मैंने सोचा, नहीं मेरी नन्हीं ऐसा कभी नहीं करेगी. मेरी नन्हीं का तो स्वयंवर करूँगा मैं! मैं उसे, देवी सीता की सेहनशीलता, मीरा का बैराग, राधा का प्रेम,

लक्ष्मी बाई की वीरता, रुख्मणि का वैभव, किरण बेदी के साहस, की शिक्षा दूंगा. मैं उसे बताऊंगा की, कैसे सीता ने जीवन के हर मोड़ पर राम, जनक और लव-कुश

का साथ देकर, स्त्रियों का मान बढाया. मैं उसे इस बात से भी परिचित करवाऊंगा की अत्याचार के खिलाफ, लक्ष्मी बाई बन उसका विरोध करो. राधा का प्रेम,

उसे, प्रेम की परिभाषा समझाएगा.

मैं अपनी नन्हीं को ऐसी दुनिया दूंगा जो, कभी थी, जहाँ सब ठीक था. लोग एक दुसरे से प्यार करते थे. किसी के मन मैं कोई द्वेष न था. जो कभी आर्यवर्त कहलाता था.

जहाँ सिर्फ एक ही जाती के मनुष्य रहते थे, मनुष्य जाती के. जो सिर्फ एक भाषा जानते थे, मनुष्यता की. हर रंग हर रूप से ऊपर एक ही धर्म था, मानव धर्म.

मेरी नन्हीं, भारत को फिर से विश्वगुरु बनाएगी. वो मुझे मेरी मंजिल तक ले जायेगी. वो मुझे एक ऐसा भारत बना कर देगी जहाँ ओनर किलिंग कभी नहीं पनप पायेगा…

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