मैं कवि नहीं हूँ!

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क्या सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है?(लेख)

Posted On: 24 Jul, 2010 Others में

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क्यूँ होता है ऐसा, भारत, हाँ भारत के विषय में जब भी सोचता हूँ, प्रश्नों के मेघों से स्वयं को घिरा पाता हूँ? प्रश्न, कुछ प्रश्न, अनेकों प्रश्न, जिनका कोई उत्तर नहीं. क्यूँ राष्ट्रीयता की भावना लुप्त होती जा रही है? क्यूँ वो ज्वाला जो कभी हमारे सीने में धधकती थी, अब शनैः-शनैः, मद्धिम और बुझती जा रही है? मुझे आज भी याद है, दसवीं की परीक्षा पास ही किया था उस वर्ष मैंने. उम्र कम थी, सिर्फ चौदह वर्ष. उर्जा और राष्ट्रीयता के भावों के पराकाष्ठा पर था मैं. सन १९९९, कारगिल युद्ध का वर्ष. पूरा देश हिंदुस्तान के सैनिकों के साथ था. मेरे शहर में फ़ौज की भर्ती के लिए शारीरिक जांच होनी थी. दरभंगा एरोड्रम, देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत युवाओं का महाकुम्भ का साक्षी बना.
सिर्फ हजार लोगों की आवश्यकता थी. लेकिन लाखों की संख्या में पुरे बिहार से युवाओं का हुजूम उमड़ पड़ा था, अपने देश केलिए जान देने को. मैं भी उनमें से एक था. मेरी तो उम्र भी नहीं थी, न्यूनतम आयु १६ वर्ष और मैं सिर्फ 14 वर्ष का. लेकिन मेरे ह्रदय में देशभक्ति का संगीत रुकने का नाम नहीं ले रहा था. चारों तरह हिंदुस्तान जिंदाबाद, हम आ रहे हैं भारत के नारे, नभ के बादलों को भी झुक कर चलने का आदेश दे रहे थे. मैं मन ही मन भारतवर्ष के युवाओं के जज्बे को देख, कुछ कर गुजरने को प्रेरित हुआ जा रहा था.
अचानक, भीड़ में भगदर मच गयी. अभी कुछ पल पहले जिन युवाओं को सैनिकों की वाहवाही करते सुना था, सैनिकों पर शब्दों के विषबाण बरसाने लगे. युवाओं ने सिर्फ हजार सैनिक चुने जाने का विरोध किया. सैनिकों का चयन स्थगित कर दिया गया.
ये क्या, अभी तक जो कल के सैनिक थे वो आज के जानवर बन गए. पुरे रास्ते, उत्पात मचाते और वन्दे-मातरम के नारे लगाते, युवाओं की टोलियों ने लुट-पाट शुरू कर दिया. लोग इधर-उधर जान बचा कर भागने लगे. पथ से विपथ भारतीय उर्जा ने बहुत उत्पात मचाया उसदिन.
मेरा मन रो पड़ा. क्या यही हैं भारत के भविष्य? युद्ध के आवेग में राष्ट्रीयता की भावना जगती हो जिनके मन में, वो क्या भारत को विश्व गुरु बनायेंगे. क्या इसे ही देशभक्त भारत कहूँ मैं? बिना युद्ध जो हिंदुस्तान के बारे में सोचने से भी हिचकिचाते हैं. क्षणिक देशभक्ति से क्या होगा इस देश का?
इन प्रश्नों ने तो उस समय भी मेरे छोटे से ह्रदय में हलचल मचाई थी. लेकिन अब, अब तो कई प्रश्न उठ गए हैं, इन प्रश्नों से भी बड़े प्रश्न. ऐसे प्रश्न जिनका हल शायद मैं अकेला न ढूंढ़ पाऊं. मेरे स्वयं के स्वाभिमान का प्रश्न, मेरे हिंदुस्तान का प्रश्न. प्रश्न जो हर भारतीय को स्वयं से पूछना होगा. प्रश्न जिसका उत्तर हर भारतीय को ढूँढना होगा. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में हैं. क्या सच में सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है? नहीं, अब सरफरोशी की तमन्ना हमारे दिल में नहीं हमारी किताबों में है.
अब सिर्फ स्वार्थ पूर्ति की तमन्ना हमारे दिल में है. मेरा बेटा, मेरी बेटी, मेरा भाई, मेरा घर, मेरी नौकरी, मेरे पैसे, मेरे शौक, मेरी कार, मेरी पत्नी, मेरी प्रेमिका, सिर्फ मेरा, मेरा और मेरा. हमारा, कहाँ है वो प्रेम, वो पीड़ा, जो कभी सबके लिए हुआ करता था. सड़कों पर वाहनों से कुचल कर कीड़े-मकोड़ों की तरह मरते लोग, परवाह किसको है? नेताओं के जूतों के बोझ तले दब कर सिसकता आम आदमी, इससे मुझे क्या? अफसरशाही के कोढ़ से पीड़ित हिंदुस्तान, मैं क्यूँ सोचूं इसके बारे में? शिक्षा के नाम पर माँ सरस्वती का हो रहा व्यापार, ये तो हमारी मज़बूरी है. कबतक, आखिर कब तक? कबतक अपने उत्तरदायित्व से मुंह छुपाते फिरेंगे हम? ये देश, ये राष्ट्र, हिंदुस्तान, ये भारत हमारा है. इसके कण-कण को शहीदों ने अपने लहू से सींचा है. क्या इसे यूँही जलता देखें हम?
भूख को देख कर क्यूँ हमारी भुजाएं भगत सिंह को याद कर, धरती का सीना चीर, अन्न के दानों से भूख का वध करने को फरकती नहीं हैं. क्यूँ हमारी स्त्रियाँ, स्वयं को शोषित मानती हैं? क्यूँ आज भारत आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं खो सा गया है. क्यूँ, जब आज जरुरत है, युवाओं के एक होने की, भारत के अस्मिता को बचाने की, वो विमुख हैं, अपने कर्तव्यों से?
जागो, भारत की स्त्रियाँ जागो! बन जाओ तुम चंडी, लक्ष्मी बाई का नाम लो, अपने ह्रदय को टटोल कर, स्वयं को पहचान लो. तुम हिंदुस्तान की स्त्री हो, तुम अभिमान हो पुरुषों का, तुम स्वाभिमान हो इस राष्ट्र का. इतिहास के पन्नों में सीता से लेकर काली तक का जिस स्वरुप का वर्णन है, वो स्वरुप तुम्हारा ही है. अब समय आ गया है. सिद्ध करदो, तुम्हारे कन्धों को सहारे की आवश्यकता नहीं. औरों को सहारा देने वाली ए भारतीय स्त्री स्वयं को पहचान.
आज चर्चा हो रही है, युवाओं के राजनीति से जुड़ने की. कौन जुड़ रहा है, क्या कभी किसी ने देखा, क्या कभी किसी ने सोचा? नयी बोतल में पुराणी शराब ही तो परोसी जा रही है. कल तक जो चौक-चौराहों पे आवारागर्दी करते थे, वो आज युवा नेता हैं. जिनका दूर-दूर तक शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं वो छात्र नेता हैं. क्यूँ, क्यूंकि आज अभी सकारात्मक उर्जा पहुँच नहीं पायी राजनीति तक. हम डरते हैं, सिर्फ कोसते हैं. नेता ऐसे हैं, नेता वैसे हैं.
आज ज़रूरत है, सरफरोशी की तमन्ना फिर दिल में जगाने की. आज ज़रूरत है, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे युवाओं के राजनीति में आने की. आज ज़रूरत है, हर भारतीय अपनी सोच बदले. ‘मैं’ के दायरे से बाहर आकर ‘हम’ के बारे में सोचे. परिवर्तन और क्रांति का पहला मूल मंत्र है, शुरुआत, मैंने की, क्या आप मेरे साथ हैं?

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Mande के द्वारा
July 12, 2016

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Nikhil के द्वारा
August 16, 2010

प्रतिक्रिया के लिए आभार राजेश जी.

rajesh के द्वारा
August 4, 2010

निखिल जी यह सच हे की कुछ लोग आज अपने स्वार्थ सिद्धि में लग कर देश को भूल रहे हे पर जिस दिन सभी लोग एस तरह के हो जायेगे तो जिस हिंदुस्तान में हम रहते हे उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा .आज भी लोगो के मन में सरफरोशी की तम्मना हे तभी तो सिया चीन ग्लेसियर में -८ डिग्री timp .में हमारे लिए लड़ रहे हे और हम उनकी बदौलत ही चैन की नींद सो पा रहे हे जरुरत हे सब के मन में ऐसे भावना जगाने की .

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
July 29, 2010

निखिल जी बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने. मैं आपके देशप्रेम को सलाम करता हूँ निखिल जी देश के लिए जैसा जज्बा आपमें है वैसा जज्बा अगर देश के प्रत्येक युवा में हो तो इस देश में एक नयी क्रांति आएगी और हमारा देश प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा नवीन कुमार शर्मा बहजोई ( मुरादाबाद) मोबाइल नम्बर – 09719390576

    Nikhil के द्वारा
    July 29, 2010

    protsahan ke liye aapka shukriya नवीन ji. अब मुझे पूरा यकीन ho gaya है, परिवर्तन जरउर aayega इस देश में. जय हिंद!

RAJESH CHAUHAN के द्वारा
July 27, 2010

निखिल जी , काश यह ज़ज्बा हमारे देश के हर नागरिक में हो . हम आपके साथ है . जय हिंद राजेश चौहान हिमाचल प्रदेश

    Nikhil के द्वारा
    July 27, 2010

    aapki pratikriya ke liye dhanyavad rajesh. yah jajzba har bhartiya me hai, bas use baahar निकालें की देर है. जय हिंद!

allrounder के द्वारा
July 26, 2010

निखिल बहुत ही बेहतरीन लेख, मुझे लगता है, एक लेखक के रूप मैं तुम अपने सर्वश्रेष्ट्र दौर मैं आ चुके हो !

    Nikhil के द्वारा
    July 27, 2010

    allrounder भाई आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. लेख आपको पसंद आया मेरी म्हणत सफल हुई. यूँही मार्गदर्शन करते रहे.

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
July 26, 2010

आपनें भर्ती रद्द होने पर हुए हंगामें के बारे में लिखा । इसका कारण है हमारी शिक्षा में देशभक्ति के बारे में जब बताया जाता है तो बताने वाला स्‍वयं बाद में देश को गालियां देता नजर आता है । ऐसे में बालमन यही सोचता है कि देश से प्‍यार करूँ या शिक्षक की शिक्षा से । और बुराईयों को आसानी से पचा लेने की गजब की क्षमता हमें दूसरी और मोड़ देती हैं और देशभक्ति युद्ध के समय क्षणभर का जज्‍बा बन जाती है । इसे जापानियों की तरह स्‍थाई बनाना जरूरी हैं । इसलिए निखिल जी सभी आपके साथ है । अरविन्‍द पारीक

    Nikhil के द्वारा
    July 26, 2010

    प्रिय पारीक जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रिया. आपने सच कहा, क्षणिक देश्बक्ति से कुछ नहीं होगा, जापानियों की तरह इसे स्थायित्व प्रदान करना होगा.

Shivashish के द्वारा
July 26, 2010

वाह ! वाह! निखिल भइया! आपके अन्दर देश के प्रति जो प्रेम है जो भावना है, उसका वर्णन शब्दों में करना मेरे लिए बहुत कठिन बात है. इतनी अच्छी पोस्ट के लिए धन्यवाद.

    Nikhil के द्वारा
    July 26, 2010

    प्रतिक्रिया के लिए आभार शिवाशिश. आपकी नयी पोस्ट पढ़ी. अच्छा लगा पढ़ कर. आपको आगे बढ़ने की शुभकामना.

kmmishra के द्वारा
July 25, 2010

लेख कहीं से भी बनावटी नहीं लग रहा है । सचमुच आपके हृदय में देश की वर्तमान स्थिति को लेकर टीस है और इसके साथ ही एक ठंडी ज्वाला भी धधकते हुये साफ देख रहा हूं । हम आपके साथ हैं । इस ज्वाला से दूसरे दिलों को भी रोशन करना होगा । एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है । लेकिन ढेर सारे चने तो भाड़ फोड़ सकते हैं । मुझे उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है । जय हिंद ।

    Nikhil के द्वारा
    July 26, 2010

    मिश्र जी, आप जैसे अनुभवी व्यक्ति की प्रतिक्रिया हमेशा उत्साहवर्धक होती है. आपलोगों के साथ से हम अपनी मंजिल ज़रूर पाएंगे. जय हिंद!

R K Khurana के द्वारा
July 25, 2010

प्रिय निखिल जी, आपने अच्छी शुरुवात की है हम सब आपके साथ है ! खुराना

    Nikhil के द्वारा
    July 26, 2010

    प्रिय अंकल जी, आपके शब्द मेरे सर पर पिता के हाथ की तरह हैं. यूँही आशीर्वाद देकर हमारा मार्गदर्शन करते रहे.

Arunesh Mishra के द्वारा
July 25, 2010

निखिल जी…जिस ईमानदारी और उर्जा से अपने विचार व्यक्त किये…सलाम करता हूँ इस उर्जा को इस देशभक्ति को…. जो आग तेरे दिल मेरे यार…वही सीने में,,,मेरे रहती है… मेरी धड़कन भी तेरे जैसे… सिर्फ देश के लिए धड़कती है… जय हिंद.. ( आईये इस “जय हिंद” को सिर्फ सुरक्षाबलो के लिए अरक्षित न करे..हम तो अपने दोस्तों से लेकर सब्जीवाले और दूधवाले को जय हिंद ही करते है…रोजमर्रा में इस शब्द का इस्तेमाल…बिना किसी अतरिक्त प्रयास के ही लोगो में देशभक्ति का एहसास जगायेगी….)

    Nikhil के द्वारा
    July 26, 2010

    अनुरेश जी आपकी प्रतिक्रिया ने जो बल दिया, उसके लिए आपका आभार. अब हर साथ के साथ ये नारा बुलंद होगा. जय हिंद!

rajkamal के द्वारा
July 24, 2010

निखिल जी ….मुझको भी अपना बचपन याद आ गया …किस तरह हम फोजियो की इज्ज़त किया करते थे …..वोह कही भी मिल जाये …उनको सेल्यूट करना अपना फ़र्ज़ समझते थे ….और उस समय तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता था ..जब जवाब मे वोह भी हमको सेल्यूट करते थे ….

    Nikhil के द्वारा
    July 25, 2010

    सही बात कही आपने राजकमल bhai. lekin ab hamare नायक सिनेमा के हीरो हैं न की हमारे सैनिक.

roshni के द्वारा
July 24, 2010

nikhli ji आप ने सही कहा आज हमारे देश को एक और क्रांति की जरुरत है… पहले हम बाहरवालों से लड़े अब भीतर के लुटरों से आजादी की जरुरत है… मुश्किल जरुर है क्युकी दुश्मन की पचन तो आसानी से हो जाती है .. मगर जो हितेषी बन कर वार करते है उनसे लड़ना मुश्किल हो जाता है … इस लड़ाई मे हम आपके साथ है ……

    Nikhil के द्वारा
    July 25, 2010

    बस यूँही साथ-साथ चलें, कारवां अब रुकेगा नहीं. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार रोशनी जी.

chaatak के द्वारा
July 24, 2010

नितिन जी, जिस नई क्रांति की मैंने बात की थी वो अब करवटें लेने लगी है| आपका ब्लॉग भी उसी क्रांति की मशाल की एक चिंगारी है| आह्वान है हर ब्लोगर का आपके हाथ में आज अभिव्यक्ति की शक्ति है, दिल में शोले हैं तो उन्हें अब लगने दो इस क्रांति की हवा जिससे इस १५ अगस्त पर रंग जाये केसरिया रंग हमारे तिरंगे का मुक्तक कर दो कलम को मष्तिष्क के झंझावातों को इस मंच पर उतारने के लिए| क्योंकि हम मूक तमाशाई बनकर सत्ता के दलाल इन राजनेताओं और अफसरों को अब शान्ति की सफ़ेद और प्राकृतिक सम्पदा का हरे रंग की नीलामी करते नहीं देख सकते| अब इन्हें केसरिया हिन्दुस्तानी रंग दिखाना ही पड़ेगा| निखिल भाई हम साथ हैं !

    chaatak के द्वारा
    July 24, 2010

    नितिन* निखिल

    rajkamal के द्वारा
    July 24, 2010

    चातक जी आज ही इस मंच पर एक नया ब्लोगर आया है …उसमे भी कुछ बात दिखती है मुझको …उम्मीद करता हू की हमारे इस कारवां का वोह भी एक जागरूक साथी बनेगा …

    Nikhil के द्वारा
    July 25, 2010

    प्रतिल्रिया के लिए धन्यवाद चातक जी. आपने सच कहा, ab स्याही से अपने bhavon ko kagaz par ukerne का वक़्त आ gaya hai. आपके साथ की आगे भी जरुरत रहेगी. धन्यवाद, निखिल झा

    Nikhil के द्वारा
    July 25, 2010

    हर साथ के साथ ये कारवां यूँही आगे बढ़ता रहेगा. अब तो बिगुल बज चूका है राजकमल भाई.


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