मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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प्यार के चार रंग(अध्याय-स्वस्तिका के साथ सम्पूर्णता का एहसास और दरभंगा वापसी-१४)

Posted On: 25 Jul, 2010 Others में

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मैंने उसे देखा तो बस देखता ही रह गया. आज कुछ ज्यादा ही खुबसूरत लग रही थी वो….. आगे….

काली साडी में लिपटी स्वस्तिका किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. गोरा बदन और उसपर काला लिबास, हुस्न का ऐसा रूप, जो किसी को भी दीवाना बना दे. मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था, क्या कहूँ, कैसे कहूँ, कुछ कहूँ या नहीं. बस मौन हो मैं उसे निहारे जा रहा था. मैंने उससे चाय के लिए पूछा. उसने हाँ में सर हिलाया. उसे कमरे में बिठा मैं चाय बनाने के लिए रसोई की तरफ गया. चाय की केतली गैस पर चढ़ा कर मेरा हाथ चाय बनाने में व्यस्त हो गया. लेकिन मेरा दिमाग अभी भी स्वस्तिका के आने के कारण को धुन्धने की कोशिश कर रहा था. क्या कारण हो सकता है? क्यूँ आई है ये, मुझसे मिलने, यूँ अचानक? अचानक चाय उबल कर गैस स्टोव पर गिरा और मैं अपने ख्यालों से बाहर आया.

दो प्यालों में चाय लेकर मैं स्वस्तिका सामने आया. एक प्याली उसे थमा कर उसके सामने बैठ चाय की चुस्की लेते हुए मैंने उससे कलकत्ता के यात्रा के बारे में पूछा. कुछ ज्यादा बोले बिना उसने यात्रा की जानकारी दे दी. मैं बार-बार उसे देख रहा था, उसकी नज़र मुझसे मिलते ही मैं झेंप जाता. न मैं कुछ बोल रहा था न वो.

“निखिल, आप यही सोच रहे हो न की मैं यहाँ क्यूँ आई?”, स्वस्तिका ने चाय की प्याली निचे रखते हुए कहा.

“नहीं, ये तो तुम्हारा ही घर है. मैं ऐसा क्यूँ सोचूंगा?”, मैंने जवाब दिया.

स्वस्तिका ने आगे कहा- निखिल, कुछ बात थी जो मैं आपको बताये बिना नहीं रह सकती. निखिल, ऐसा क्यूँ हुआ मेरे साथ मुझे पता नहीं. बस हुआ है. राजीव से बहुत प्यार करती हूँ मैं. हमने शादी भी इसी कारण की. आज भी उससे उतना ही प्यार करती हूँ मैं. राजीव भी मुझे बहुत प्यार करता है.

“हम्म, मैं क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए? कोई समस्या है क्या?”, मैंने अधीर होते हुए पूछा.

“नहीं-नहीं, हमारे रिश्ते में कोई समस्या नहीं है. हम तो बहुत खुश हैं.”

एक और बात है, मेरा आपके लिए आकर्षण. मैं चाह कर भी आपको नहीं भूल पाती. हमेशा कोशिश करती हूँ की आपका ख्याल न आये मुझे, सोच कह्तम होते ही आपके ख्यालों में घिर जाती हूँ. मुझे आपसे भी प्यार हो गया है. फर्क सिर्फ इतना है की राजीव मेरे पति हैं और आप नहीं. एहसास और तड़प एक जैसे ही हैं.

उसके एक-एक शब्द मेरे कानों को तो अछे लग रहे थे लेकिन मेरा मस्तिष्क बार-बार मुझे सतर्क कर रहा था. मेरे दिल की धडकनें बढ़ गयी थी. अभी कुछ दिनों पहले एक-दुसरे के करीब न आने की बात करने वाली स्वस्तिका के मुंह से ये सब सुनकर थोडा आश्चर्य लगा मुझे. मैं गौर से उसकी बातें सुनने लगा.

“मैंने आपसे एक बात छुपायी. कैसे बताऊँ समझ नहीं आ रहा.”, स्वस्तिका कहते-कहते रुक गयी.

“कौन सी बात. तुम हर बात बता सकती हो मुझे.”, मैंने उसे समझाते हुए कहा.

“राजीव कभी बाप नहीं बन सकते. उनके ह्रदय मैं तो मेरे लिए बहुत प्यार है लेकिन उनके शरीर में मुझे प्यार करने की ताकत नहीं. पिछले आठ सालों से मैंने जिस आग को दबा कर रखा था वो “, इतना कह कर स्वस्तिका सुबकने लगी.

मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा था. ये क्या हो रहा है, एक मकडजाल से निकलता हूँ तो दुसरे में फंस जाता हूँ. इस दुनिया के मायाजाल में इन्सान के फंस कर अकुलाने की कथा ज्ञात हो गयी मुझे. क्या करूँ, क्या कहूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा था. अपनी भावनाओं पर काबू पाते हुए मैंने उसे पूरी बात बताने को कहा. मेरी आँखें एक पल के लिए भी उससे अलग नहीं हो रही थी.

“क्या आप एक बार मुझे वो सुख दे सकते हैं, वो सुख जिसके लिए मैं पिछले ८ बरस से तड़प रही हूँ. उसके बाद मैं आपसे कभी नहीं मिलूंगी. मैं माँ बनाना चाहती हूँ निखिल. क्या आप मुझपर ये एहसान करोगे?”

“बस एक बार, मैंने अपनी ज़िन्दगी मैं कभी किसी से कुछ नहीं माँगा. हर बार जीवन के दिए सौगातों के साथ समझौता ही किया है. बस एक बार, बस एक बार मैं समझौता नहीं करना चाहती. बस एक बार मैं अपने दिल की आवाज़ सुनना चाहती हूँ. बस एक बार.”, कहते-कहते उसने मुझे बाहों में भर लिया.

मैं अवाक्, कुछ समझ नहीं आया मुझे. स्वयं पर काबू पाने की कोशिश करते हुए मैं उसे सुनने की कोशिश करने लगा. मुझसे लिपट कर उसने अपने दिल की हर बात बताई मुझे. उसने मुझे समझाने का प्रयास किया की अगर मुझे इस बात पर आपत्ति है तो वो आगे कुछ न बोलेगी. मैं निशब्द था. कुछ भी नहीं सूझ रहा था मुझे. सही गलत, सच-झूठ, पाप-पुण्य, कुछ भी नहीं. उसे गले लगाये मेरा दिमाग बार-बार मुझे आगे न बढ़ने की हिदायत दे रहा था. लेकिन मेरा दिल, मेरा दिल स्वस्तिका के गिरफ्त में था. उसके आलिंगन ने तो जैसे मुझे उसका गुलाम बना दिया. मेरी समझदारी ने काम करना बंद कर दिया. मेरा सोचना बंद हो गया. आँखें उसके अलावा कुछ और देख नहीं पा रही थी.

“स्वस्तिका, मैं तो अकेला हूँ. मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है. लेकिन क्या ये ठीक है? समाज की बेड़ियाँ और नियमों को तोडना कहाँ तक जायज़ है? मैं क्या करूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा?”, स्वस्तिका के नाम आँखों में झांकते हुए मैंने कहा.

“कुछ मत सोचो निखिल. बस एक बार, एक बार मुझे पूरा कर दो. नारी की पूर्णता का जो एहसास मैं करना चाहती हूँ, उस एहसास को tumse पाकार मैं धन्य हो जाउंगी. अपनी मीरा की इस विनती को सुन लो मेरे श्याम.”, स्वस्तिका मुझसे लिपटते हुए बोली.

कबतक, आखिर कबतक रोक पाता मैं स्वयं को. मैंने अपना संयम खो दिया. भर लिया मैंने उसे अपने आगोश मैं. उसके गेसुओं से खेलते हुए मैं उसकी आँखों की गहराई मापने लगा. उसके होंठों की तपिस का अनुभव मात्र ही पर्याप्त था, मुझे सबकुछ भुला देने को विवश करने के लिए. उसकी गर्म होती सांसें मेरी साँसों से टकरा कर बिहार रही थी. फिजाओं में मद्धिम सा रस घुल गया था. मदहोश कर देने वाला रस. हवाओं में न जाने कहाँ से पुरे जहाँ की मादकता आ समायी थी. उसके थरथराते होंठों पर मेरे होंठों की छुअन ने एक साथ ही मैं उसमे समां गया. गर्म साँसों और अद्भुत प्रेमानुभूति का संगम, एक अनूठा अनुभव था मेरे लिए. स्वस्तिका को सम्पूर्णता का एहसास करने के अपने प्रयास में मैं स्वयं को संपूर्ण पा रहा था. प्रेम का तूफान जब थमा, अपने साथ कई चीजों को रोक दिया उसने.

अब क्या, फिर से विरह, इसबार की पीड़ा पहले से कहीं ज्यादा. सम्पूर्णता के एहसास के बाद फिर से अधूरे होने के ख्याल मात्र ने मुझे सम्मोहन से खींच कर जमीन पर पटक दिया.

“निखिल, मैं बता नहीं सकती मैं आज कितनी खुश हूँ. आज मुझे पहली बार एक स्त्री होने का एहसास हुआ है. मैं तुम्हें कभी भूल नहीं पाउंगी”, मेरे सीने पर अपनी उँगलियाँ फिराते हुए उसने कहा.

स्वस्तिका ने तो पूर्णता का एहसास कर लिया था, लेकिन मेरी सम्पूर्णता क्षणिक थी. मस्तिष्क में फिर से वही प्रश्न आ रहे थे. प्रेम, क्या है ये प्यार. इस अधूरेपन को पूरा करने की मेरी तमन्ना और दृढ होती जा रही थी. इस अनुभव के बाद जो एक प्रश्न आया था मेरे मस्तिष्क में उसने मुझे बेचैन कर दिया.

स्वयं से घृणा हो गयी मुझे. इतना कमजोर कैसे हो सकता था मैं. दो पल की ख़ुशी के लिए, दो पल के आनंद के लिए जीवन के सारे मूल्यों को सारे आदर्शों यूँ भूल गया. शरीर के आकर्षण में सबकुछ भूल कर कैसे अपने मूल्यों का सौदा कर लिया मैंने. स्वस्तिका ने उस वक्त जो भी कहा मैं कुछ सुन नहीं पाया. हाँ उसके आखरी शब्द ज़रूर मेरे कानों में परे, अब हम कभी नहीं मिलेंगे. निखिल, तुम बहुत अछे हो. काश की हम पहले मिले होते. काश की तुम, तुम न होकर, मेरे होते.

वो चली गयी. मुझे बेचैन कर और मुझे तड़पता छोड़ कर चली गयी. लेकिन इस बार मैं दुखी नहीं था. इस बार मैं घिरा हुआ था, एक प्रश्न से, एक जटिल प्रश्न से.

क्या है प्यार? क्या सच में अपरिभाषित है प्रेम?

दुनिया बदल गयी, लोग बदल गए और साथ-साथ मेरी सोच भी बदलने लगी. बदलाव, हाँ ये बदलाव तो नियम है संसार का. हर चीज बदलती है, संस्कार, सभ्यता, आदर्श और जीवन के मूल्य. आज उस बदलाव को महसूस कर रहा था मैं. एक प्यास जगी थी मन में, प्रेम की तलाश की, तीव्र प्यास.

ऑफिस में काम तो करने बैठा था मैं उसदिन लेकिन काम नहीं कर पा रहा था. सोच बदल गयी थी. कल तक जिस काम को करने में आनंद आता था आज वही काम कुछ अजीब सा लगा मुझे. नहीं, मैं अब और काम नहीं करूँगा यहाँ. राष्ट्रीय की भावना एकबारगी ही हावी हो गयी मुझपर. कल तक युवाओं के स्वप्न महल की तरह लगने वाला बी.पी.ओ मुझे अप्रत्यक्ष ग़ुलामी की तरह लगने लगा. कल तक स्त्रियों के साथ मेरा प्रेम का सम्बन्ध, प्रेम की सीमा तय कर रहा था, आज ये कहीं आगे चला गया. एक पल के लिए मैंने अपनी आँखें बंद की और निर्णय लेने का मन बनाया. अपनी सीट से सीधा उठकर मैं मैनेजर के कमरे में गया और अपना इस्तीफा सौंप, ऑफिस प्रांगन से बाहर निकल गया.

आधी रात को नोएडा के सुनसान सड़कों पर विचरण करता मैं, खली मस्तिष्क और कुछ प्रश्न के साथ किसी सवारी की प्रतीक्षा करने लगा. थोड़ी देर में एक ऑटो आया. मैं ऑटो से घर पहुँच कर बेड पर लेट गया.

सुबह आँखें खुली तो बिपिन को चाय के साथ खड़ा पाया. चाय की चुस्की लेते हुए मैंने बिपिन से कहा की मैं घर वापस जा रहा हूँ. वहीँ जाकर कुछ करूँगा. उससे मैंने कुछ बातें छुपायी. मैंने उसे नहीं बताया की प्यार के रंगों की अपनी अधूरी तलाश को पूरा करना चाहता था. मैं ये जानना चाहता था की प्रेम आखिर है क्या? अपने इसी प्रयास में मैं घर वापसी चाहता था. थोड़े दिन आराम कर, थोडा सा समय देना चाहता था मैं स्वयं को.

“अच्छा ठीक है, लेकिन घर जाकर करेगा क्या? वैसे भी दरभंगा में रखा क्या है?”, बिपिन ने घूरते हुए पूछा.

“मुझे पता नहीं की दरभंगा में क्या है और क्या नहीं. बस मन किया जाना है तो जाना है. अब जो भी करना परे कोई फर्क नहीं परता. मैं अब यहाँ एक पल भी नहीं रुक सकता. इस जगह से दूर जाकर शायद कुछ समझ पाऊं.”

एक बार और, फिर से एक बार, किसी स्थान से दूर जाने की बात कर रहा था मैं. दूर जाने की बात थी या, खुद से भागने की या एक अनबुझ रास्ते पर एक अनबुझ यात्रा की तयारी कर रहा था मैं. किसको पता था. न मुझे पता था न किसी और को. बिपिन से थोड़ी बहुत बहस करने के बाद मैंने जाने का निश्चय कर लिया. नहाने के बाद निचे जाकर मैं पास के ही एक ब्रोकर से दरभंगा की एक टिकट ले आया.

बिपिन, शिव, अवनीश, और राजन मुझे छोड़ने के लिए स्टेशन तक आये थे. गाडी में बैठते ही एक अजीब से एहसास से घिर गया. एहसास था या एक खालीपन. कुछ समझ नहीं आ रहा था. रेल की पटरी पर दौड़ लगाती गाडी फुल स्पीड में अपने गंतव्य की तरफ दौरे जा रही थी. गाडी की गति से भी तेज गति से मेरा मस्तिष्क एक रहस्य को ढूंढने की कोशिश में लगा हुआ था. रहस्य, अचानक सबकुछ बदल जाने का रहस्य. समय की गति का रहस्य, जो होता है वो क्यूँ होता है और जो होगा वो क्यूँ होगा? ये सब रहस्य ही तो था. एक ऐसा रहस्य जिसकी तलाश हर चेतन मन को होती है. इस रहस्यों से परदे के उठाने के इन्तेजार के साथ दरभंगा पहुँचाने का मेरा इन्तेजार अगले २२ घंटों तक चला. मैं पहुँच गया था. दरभंगा, अपने अस्तित्व के अंकुरित होने के स्थान पर.

क्रमशः:

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