मैं कवि नहीं हूँ!

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ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता?

Posted On: 21 Oct, 2011 Others में

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ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता
ना ज़मीन होती खूबसूरत,
ना ये आसमानी रंगों कि चित्रकारी होती,
ना होता हुस्न का दीदार,
ना होती दीवाली और ना धुप बयां होताimages


ना होती गर  ये आँखें मेरी, तो क्या होता
तेरे माथे पर आये लटों के अक्स, ना होते दिल के अंदर,
ना तेरे कंपकपाते होंठों कों गज़ल बनाता मैं
ना मिलता सुकून फिर तेरी पलकें झुकाने पर
ना तेरी पलकों से गिरते आंसूं मैं होठों से चुनता


ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता

ना रंगों कि पहचान होती
ना मंजिल आसान होती,
ना सूरत होती निगाहों में,
और ना बदसूरती का निशां होता
ना होती गर ये आँखें मेरी, तो क्या होता

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685 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अलीन के द्वारा
February 5, 2012

निखिल जी, नमस्कार! आपकी रचना ‘ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता’ पढ़ा बहुत अच्छा लगा…और जुबान से बस एक यही बात निकल… न होती गर आँखें तो क्या होता, न मैं होता, न तू होता न होते गर हम तो क्या होता, न कोई राँझा, न कोई हीर होता, न होते गर जख्म, तो क्या होता, न कोई अलीन, न कोई मीर होता, न होती गर आँखे तो…. कभी-कभी सोचता हूँ क्या होता…..शायद आपकी द्वारा लिखीगई खुबसूरत रचना पढने से वंचित होता…..बधाई के पात्र.

div81 के द्वारा
October 23, 2011

सुन्दर रचना निखिल जी| आँखे ………. इस खूबसूरत दुनिया को देखने के लिए ही नहीं खूबसूरत भावों को पढ़ने के लिए भी :) आपको और आपके परिवार को दीपावली कि शुभकामनाये

    Nikhil के द्वारा
    October 23, 2011

    प्रिय दिव जी, आपकी कवितायेँ पढ़ी हैं मैंने. एक अच्छी कवयित्री से तारीफ़ सुनकर कर प्रोत्साहन मिला. आपको भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

    Grizzly के द्वारा
    July 12, 2016

    No quesoitn this is the place to get this info, thanks y’all.

आर.एन. शाही के द्वारा
October 23, 2011

सही कहा निखिल जी ! दीद न होती, तो ईद भी न होती । खुदा की इस नेमत के बिना दुनिया रंगहीन और स्वादहीन बन कर रह जाती है । बधाई !

    Nikhil के द्वारा
    October 23, 2011

    आदरणीय शाही जी, आपकी प्रतिक्रियाओं ने हमेशा से प्रोत्साहन दिया है. अपने आशीर्वाद और प्यार से ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहे. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

    Alexavia के द्वारा
    July 12, 2016

    Lot of smarts in that positng!

UMASHANKAR RAHI के द्वारा
October 22, 2011

भाई निखिल जी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें आखिर आँखें क्यों नहीं होतीं और जिनके वही चक्षु नहीं होते उनके अंत: चक्षु खुल जाते हैं सूरदास जी ने श्री कृष्ण के स्वरूप का इतना सुंदर वर्णन किया है आँखों वाले नहीं कर सकते

    Nikhil के द्वारा
    October 23, 2011

    प्रिय राही जी, सूरदास जी की अनमोल रचनाओं से बहुत कुछ सीखा जा सकता है. उनकी रचनाओं की याद दिलाने के लिए शुक्रिया. आपको भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
October 22, 2011

लाजवाब रचना निखिल भाई। यूँ तो मेरे समेत बहुतों ने आँखों पर बहुत सी रचनाएँ पढ़ी और लिखी हैं मगर आप की रचना में कुछ अलग ही भाव मिले। बहुत बधाई सुन्दर रचना के लिए।

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    वाहिद भाई आपकी प्रतिक्रिया पाकर बड़ा सुकून मिला मन को. प्रोत्साहन के लिए आभार. दीपवाली की हार्दिक shubhkaamnayein

    Philly के द्वारा
    July 12, 2016

    This forum needed shiknag up and you’ve just done that. Great post!

krishnashri के द्वारा
October 22, 2011

महोदय , भाव पूर्ण अभिव्यक्ति ,जीवन की सच्चाई , आँखें तो आँखें हैं , बिना आँखों के क्या दीवाली क्या धुप बयां / बहुत सुन्दर पंक्तियाँ / बधाई /

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया कृष्ण जी. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

Syeds के द्वारा
October 22, 2011

आँखें कुदरत का अनमोल तोहफा हैं…बेहतरीन रचना… बधाई… http://syeds.jagranjunction.com

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

Tamanna के द्वारा
October 22, 2011

आंखे प्रकृत्ति का सबसे खूबसूरत तोहफा है. बहुत बढिया रचना है…. http://tamanna.jagranjunction.com/2011/10/15/prashant-bhushan-controversial-statement-on-kashmir-issue/

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार तमन्ना जी. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

alkargupta1 के द्वारा
October 22, 2011

निखिल जी, इन सुन्दर सी आँखों से ही हम प्रकृति के सब रंग देखते हैं इनके न होने से इंसान की दुनिया रंगहीन हो जाती है……बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार अलका जी.

nishamittal के द्वारा
October 21, 2011

ना होती गर ये आँखें मेरी तो क्या होता ना रंगों कि पहचान होती ना मंजिल आसान होती, ना सूरत होती निगाहों में, और ना बदसूरती का निशां होता ना होती गर ये आँखें मेरी, तो क्या होता बहुत सुन्दर रचना और विशेष रूप से उपरोक्त पंक्तियाँ

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    आदरणीय निशा जी, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार. दीपावली की हार्दिक shubhkaamnayein

    Kairii के द्वारा
    July 12, 2016

    You’ve got it in one. Condlu’t have put it better.

Santosh Kumar के द्वारा
October 21, 2011

निखिल जी,.नमस्कार ,.बहुत ही उम्दा रचना की हार्दिक बधाई ,.शुभ दीपवाली की मंगलकामनाएं

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार संतोष जी. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

Abdul Rashid के द्वारा
October 21, 2011

निखिल जी बेहतरीन रचना दीपावली की हार्दिक सुभकामनाओ के साथ सप्रेम अब्दुल रशीद http://singrauli.jagranjunction.com

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार अब्दुल रशीद जी,. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

    Eagle के द्वारा
    July 12, 2016

    i liked Bahgban or its a good film. I just prefer it to K3g and KANK. Babul seem to be even worse then Baghban (frm the promos, reviews etc) so i wont check it out. I can almost say that i prefer K3G to Babul without even seeing babul

abodhbaalak के द्वारा
October 21, 2011

खूबसूरत कविता निखिल जी सच तो ये है की अगर आँखें हैं और उनमे नूर है तो ही दुनिया, दुनिया है वरना… ऐसे ही लिखते रहे http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    अबोध जी आपकी प्रतिर्क्रिया के लिए आभार. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं.

    Armena के द्वारा
    July 12, 2016

    Hey, you’re the goto extepr. Thanks for hanging out here.

manoranjan thakur के द्वारा
October 21, 2011

बेहतरीन रचना बधाई

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    October 21, 2011

    निखिल भाई क़माल की होती ही हैं ये आँखें ..ये आँखें बोलती हैं ..पढ़ती हैं ..ख़त के अन्दर का दिल के अन्दर का मजमून ..सुन्दर ..बधाई हो …हाजिरी कम लग रही है ? ना तेरे कंपकपाते होंठों कों गज़ल बनाता मैं ना मिलता सुकून फिर तेरी पलकें झुकाने पर ना तेरी पलकों से गिरते आंसूं मैं होठों से चुनता भ्रमर ५

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार मनोरंजन भाई.

    Nikhil के द्वारा
    October 22, 2011

    शुक्ल जी, ये आँखें हैं ऐसी, हर शख्स की पहचान है ये आँखें. आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार.


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