मैं कवि नहीं हूँ!

मैं कवि नहीं हूँ! निराला जैसी कोई बात मुझमे कहाँ!

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कफनचोर

Posted On: 3 Jul, 2014 Others में

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सन्नाटा था, और अँधेरा होने
को था
कुत्तों का रोना किसे रास आता है
वो सो चूका था
आखरी नींद
साँसों ने साथ छोड़
दिया था
और वो निढाल परा था
शांत हर गम
से दूर
निश्चिन्त हो
अपनी अंतिम यात्रा
की तयारी कर रहा था
पास परिजन
विलाप कर रहे थे
आह! कितना करूँ दृश्य था
मन चीत्कार उठे
अश्रुओं की धार
ने धरती को तर
कर दिया
लेकिन कुछ लोगों के
मन में कुछ और है
वहीँ कुछ षड्यंत्र
हो रहा है
कफ़न की नीलामी
का बंदोबस्त कर
रहा है कोई
किसी के मन में
उसके मरने से
नाच रहा है मोर
कोई उतारू है
बनने को कफनचोर

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
July 4, 2014

सारगर्भित रचना आदरणीय निखिल जी

    Mitchell के द्वारा
    July 12, 2016

    Surgiisrnply well-written and informative for a free online article.


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